Arbitration | आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल द्वारा धारा 16 के तहत आवेदन खारिज करने को चुनौती देने के लिए अनुच्छेद 227 का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-07-15 06:21 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (14 जुलाई) को कहा कि हाईकोर्ट के लिए अपने सुपरवाइजरी अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के उस फैसले में दखल देना सही नहीं है, जिसमें ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को चुनौती देने वाले आर्बिट्रेशन एंड कंसिलिएशन एक्ट की धारा 16 के तहत आवेदन को खारिज कर दिया गया।

जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने कहा,

"...हमारा मानना ​​है कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत चुनौती पर विचार करना और आर्बिट्रेशन की कार्यवाही पर रोक लगाना हाईकोर्ट के लिए सही नहीं था। एक्ट की धारा 16 के तहत आवेदन खारिज होने के खिलाफ उपाय केवल अंतिम अवार्ड सुनाए जाने के बाद एक्ट की धारा 34 के तहत ही उपलब्ध है। इसलिए हम हाईकोर्ट के दोनों विवादित आदेशों को रद्द करना और हाईकोर्ट के समक्ष रिवीजन याचिका खारिज करना उचित समझते हैं।"

बेंच ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें गैर-हस्ताक्षरकर्ता पार्टियों द्वारा दायर धारा 16 के आवेदन को आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल द्वारा खारिज किए जाने को चुनौती देने वाली रिवीजन याचिका पर विचार किया गया।

यह विवाद 1948 में बेज़बोरुआ परिवार द्वारा बनाई गई पार्टनरशिप फर्म से जुड़ा है। 16 नवंबर, 1976 को किए गए पार्टनरशिप डीड में एक आर्बिट्रेशन क्लॉज़ शामिल है।

ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा आर्बिट्रेशन के लिए रेफरेंस की मांग वाली याचिका खारिज किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पार्टियों की सहमति से विवादों के निपटारे के लिए एक सोल आर्बिट्रेटर नियुक्त किया।

प्रतिवादी संख्या 1 से 3, हालांकि कार्यवाही में शामिल पक्ष थे, लेकिन उन्होंने रेफरेंस का विरोध नहीं किया।

रेफरेंस के बाद आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने मुद्दे तय किए। प्रतिवादी संख्या 1 से 3 ने अपने नाम हटाने के लिए आवेदन दायर किए, जिसमें तर्क दिया गया कि गैर-हस्ताक्षरकर्ता होने के कारण, वे आर्बिट्रेशन समझौते से बंधे नहीं थे। ट्रिब्यूनल ने 4 अगस्त, 2025 को आवेदनों को खारिज कर दिया।

इससे असंतुष्ट होकर प्रतिवादी संख्या 1 से 3 ने गुवाहाटी हाई कोर्ट के समक्ष अनुच्छेद 227 के तहत रिवीजन याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने 2 सितंबर, 2025 को ट्रिब्यूनल के नोटिस पर रोक लगा दी और 28 जनवरी, 2026 को रिविज़न याचिका को सुनवाई के योग्य माना।

इससे असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

विवादित आदेश रद्द करते हुए जस्टिस बिश्नोई के फैसले में कहा गया कि यह एक्ट एक "सेल्फ-कंटेन्ड कोड" (अपने आप में पूर्ण कानून) है और धारा 5 न्यायिक दखल को रोकता है, सिवाय उन मामलों के जहां एक्ट में स्पष्ट रूप से इसकी व्यवस्था हो। धारा 16 आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल को 'कोम्पेटेन्ज़-कोम्पेटेन्ज़' (kompetenz-kompetenz) के सिद्धांत के तहत अपने अधिकार क्षेत्र पर फैसला करने का अधिकार देता है।

कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने आर्टिकल 227 के तहत रिविज़न याचिका पर विचार करके एक गंभीर गलती की, क्योंकि आर्टिकल 227 के तहत दखल केवल तभी जायज़ है, जब "इनहेरेंट ज्यूरिस्डिक्शन (अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र) की स्पष्ट कमी" हो।

कोर्ट ने कहा,

"ऐसे मामलों में जहां नॉन-सिग्नैटरी (बिना हस्ताक्षर वाले) पक्ष शामिल हों, रेफरल कोर्ट को केवल आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट के अस्तित्व पर शुरुआती तौर पर (prima facie) फैसला करना होता है। यह तय करने का जटिल काम आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल पर छोड़ दिया जाता है कि क्या नॉन-सिग्नैटरी वास्तव में एग्रीमेंट से बंधा है या नहीं। यह व्याख्या एक्ट की धारा 16 में दिए गए 'कोम्पेटेन्ज़-कोम्पेटेन्ज़' सिद्धांत को सही मायने में लागू करती है, जो आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल को अपने अधिकार क्षेत्र पर फैसला करने का अधिकार देता है। इसलिए आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल के पास यह तय करने का पूरा अधिकार है कि क्या रेस्पोंडेंट नंबर 1 से 3 आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट के असली पक्ष थे या नहीं, भले ही उन्होंने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए। इसलिए इस मामले में ट्रिब्यूनल के आदेश को हाईकोर्ट में आर्टिकल 227 के तहत याचिका दायर करके चुनौती नहीं दी जानी चाहिए।"

हाईकोर्ट को अधिकार-क्षेत्र की स्पष्ट कमी के बारे में शुरुआती निष्कर्ष दर्ज करना चाहिए

कोर्ट ने यह बात कही,

“यह कानून की स्थापित स्थिति है कि जब आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल द्वारा एक्ट की धारा 16 के तहत किसी आवेदन को खारिज करने को चुनौती दी जाती है तो भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अपनी निगरानी संबंधी अधिकार-क्षेत्र का इस्तेमाल करते समय हाई कोर्ट को बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। अगर अधिकार-क्षेत्र में ऐसी कोई स्पष्ट कमी नहीं है तो शुरुआती चरण में न्यायिक दखल अनुचित होगा और आर्बिट्रेशन की कार्यवाही में कम से कम अदालती दखल की विधायी नीति के खिलाफ होगा। एक्ट की धारा 16 के तहत आवेदन पर ट्रिब्यूनल द्वारा पारित आदेशों को आम तौर पर केवल एक्ट की धारा 34 के तहत आर्बिट्रेशन की कार्यवाही पूरी होने और अंतिम फैसला (अवार्ड) आने के बाद ही चुनौती दी जा सकती है। हाईकोर्ट के लिए यह हमेशा सुरक्षित रहता है कि आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल द्वारा एक्ट की धारा 16 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए पारित आदेशों के खिलाफ भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत रिवीजन याचिका पर विचार करने से पहले वह अधिकार-क्षेत्र की स्पष्ट कमी के बारे में शुरुआती निष्कर्ष दर्ज करे, और वह भी विरोधी पक्ष/पक्षों को सुनवाई का मौका देने के बाद।”

ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए अपील स्वीकार की गई।

Cause Title: MANASH KAMAL BEZBORUAH VERSUS M/S BOKAHOLA TEA COMPANY PRIVATE LIMITED & ORS.

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