बरी करने का फ़ैसला पलटने वाली अपीलीय अदालत को सज़ा के मामले में दोषी की बात खुद सुननी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-05-27 05:59 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (26 मई) को फ़ैसला सुनाया कि अगर कोई अपीलीय अदालत बरी करने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील की सुनवाई करते हुए आरोपी को दोषी पाती है तो वह सज़ा सुनाने के लिए मामला ट्रायल कोर्ट को वापस नहीं भेज सकती। अपीलीय अदालत को सज़ा के मामले में दोषी की बात खुद सुननी होगी।

जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने कहा,

"CrPC की धारा 386(a) से यह साफ़ है कि जहां बरी करने के आदेश के ख़िलाफ़ अपील में अपील सुनने वाली अदालत आरोपी को दोषी पाती है, तो उसे क़ानून के मुताबिक़ उस पर सज़ा सुनानी होगी।"

बेंच ने कलकत्ता हाईकोर्ट की पोर्ट ब्लेयर सर्किट बेंच का फ़ैसला रद्द किया, जिसमें आरोपी को बरी करने का फ़ैसला पलटने के बाद सज़ा सुनाने के लिए मामला ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया गया था।

अदालत ने कहा,

"अगर अपीलीय अदालत ही बरी करने का फ़ैसला पलटने के बाद पहली बार आरोपी को दोषी ठहरा रही है तो अपीलीय अदालत को सज़ा के मामले में दोषी की बात सुननी होगी। अपीलीय अदालत आरोपी को दोषी ठहराने का फ़ैसला सुनाने के बाद सिर्फ़ सज़ा सुनाने के लिए मामला ट्रायल कोर्ट को वापस नहीं भेज सकती। ऐसा करना CrPC की धारा 386(a) और इस अदालत के फ़ैसलों के ख़िलाफ़ होगा।"

इस मामले में अपीलकर्ता पर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की ट्रायल कोर्ट में भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 376, 312 और 417 के तहत दंडनीय अपराधों के लिए मुक़दमा चला। अपने फ़ैसले में ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को सभी आरोपों से बरी किया था, जिसके बाद बरी करने के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ पोर्ट ब्लेयर स्थित हाईकोर्ट में अपील दायर की गई।

हाईकोर्ट ने अपने विवादित आदेश में अपीलकर्ता को ट्रायल कोर्ट जज के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया। आगे यह भी निर्देश दिया कि सरेंडर करने पर ट्रायल कोर्ट के जज उसे हिरासत में लेंगे और क़ानून के मुताबिक़ सज़ा के बिंदु पर सुनवाई करने के बाद IPC की धारा 376/312 के तहत उचित सज़ा सुनाएंगे।

हाईकोर्ट के इस आदेश से नाराज़ होकर आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। विवादित आदेश रद्द करते हुए जस्टिस विश्वनाथन द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि हाईकोर्ट ने सज़ा सुनाने के मकसद से मामले को ट्रायल कोर्ट के विचार के लिए वापस भेजने में गलती की। [देखें कुमार एक्सपोर्ट्स बनाम शर्मा कारपेट्स, (2009) 2 SCC 513]

कोर्ट ने टिप्पणी की,

“अपीलीय कोर्ट को न केवल आरोपी को दोषी पाए जाने के बाद सज़ा सुनाने के मकसद से ही मामले को ट्रायल कोर्ट को वापस नहीं भेजना चाहिए, बल्कि उसका यह अनिवार्य कर्तव्य है कि वह आरोपी की बात सुने और उचित सज़ा सुनाए।”

तदनुसार, अपील आंशिक रूप से स्वीकार की गई और हाईकोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह दोषी को सज़ा के मुद्दे पर सुनने के लिए एक तारीख तय करे।

Cause Title: Mukesh Kumar Yadav Versus The State (UT of Andaman & Nicobar Islands) Etc.

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