Air Force Act | एक ही आरोप पर आपराधिक मुकदमे में बरी हुए अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-04-16 08:09 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (15 अप्रैल) को कहा कि एक बार जब रक्षा बलों ने अनुशासनात्मक कार्रवाई के बजाय आपराधिक कार्रवाई को जारी रखने का फैसला कर लिया हो तो आपराधिक कार्रवाई में बरी होने के बाद उस रक्षा कर्मी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।

दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने पूर्व-वायु सेना कर्मी का सम्मान बहाल किया। उन्हें लगभग तीन दशक बाद सेवा से जुड़े सभी लाभ दिए गए; उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई में बरी होने के बाद भी अनुशासनात्मक जांच की गई थी।

बेंच ने कहा,

"...वायु सेना ने जब कथित अपराध की सुनवाई आपराधिक अदालत में कराने का फैसला किया तो यह साफ है (ऊपर की चर्चा को देखते हुए) कि वे फिर न तो कोर्ट मार्शल का सहारा ले सकते हैं और न ही कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकते हैं। एक बार जब कोई रास्ता चुन लिया जाता है तो यात्री को उस पर अंत तक चलना ही पड़ता है।"

कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि "एक बार जब अपीलकर्ता को आपराधिक अदालत ने बरी कर दिया हो, तो मामला वहीं खत्म हो जाना चाहिए।"

कोर्ट ने कहा,

"अपीलकर्ता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए प्रशासनिक प्रक्रिया शुरू करना, हम बिना किसी हिचकिचाहट के कहते हैं, कानून की नज़र में गलत और अमान्य था।"

कोर्ट ने आगे कहा,

"एक बार जब कोई आरोपी बरी हो जाता है तो वह उन सभी लाभों का हकदार होता है, जो आमतौर पर बरी हुए व्यक्ति को मिलते हैं। उसे किसी भी तरह से कमज़ोर स्थिति में नहीं रखा जा सकता।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि 'यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम हरजीत सिंह संधू' (2001) 5 SCC 593 मामले में आर्मी एक्ट की धारा 19 और 125 तथा आर्मी रूल्स के नियम 14 की जांच करते समय—जो क्रमशः AF Act की धारा 19 और 124 तथा 1969 के नियमों के नियम 6 के समान हैं—सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जहाँ कमांडिंग ऑफिसर, आपराधिक अदालत या कोर्ट मार्शल में से किसी एक को चुनने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए आपराधिक अदालत में सुनवाई का विकल्प चुनता है, तो उस अदालत द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के साथ ही मामला पूरी तरह से खत्म हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करना या उसे जारी रखना सही नहीं माना जाएगा।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"हालांकि हरजीत सिंह संधू (उपर्युक्त) मामले में तय किया गया कानून आर्मी एक्ट और आर्मी रूल्स के प्रावधानों पर विचार करने के बाद बनाया गया, लेकिन ऐसा कोई कारण नहीं है कि यह AF Act और AF रूल्स के समान प्रावधानों (pari materia provisions) के तहत आने वाले मामले पर पूरी तरह से लागू न हो।"

"यह सच है कि हरजीत सिंह संधू (उपर्युक्त) के अनुसार, जब किसी आरोपी को 'बरी' (Acquitted) कर दिया जाता है तो उसके खिलाफ प्रशासनिक कार्यवाही शुरू करना वर्जित होता है। हालांकि, हमें ऐसा कोई कारण नहीं दिखता कि इस फैसले का सिद्धांत (Ratio) उस मामले पर लागू न हो, जिसमें आरोपी को 'मुक्त' (Discharged) कर दिया गया हो (जो कि बरी होने से भी बेहतर स्थिति में होता है, जैसा कि ऊपर चर्चा की गई)। एक बार जब आपराधिक कोर्ट द्वारा अपीलकर्ता को मुक्त कर दिया जाता है, तो उस मामले का वहीं अंत हो जाना चाहिए।"

Cause Title: EX. SQN. LDR. R. SOOD VS. UNION OF INDIA & ORS.

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