सिक्किम हाईकोर्ट ने कहा कि एक ही घटना के दौरान किसी बच्चे के स्तनों को दो बार छूना, 'यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण' अधिनियम (POCSO Act), 2012 की धारा 9(l) के तहत 'गंभीर यौन हमला' (एग्रवेटेड सेक्सुअल असॉल्ट) माना जाएगा।

धारा 9(l) तब लागू होती है, जब कोई व्यक्ति किसी बच्चे के साथ एक से अधिक बार या बार-बार यौन हमला करता है।

जस्टिस भास्कर राज प्रधान ने टिप्पणी की,

"एक ही घटना के दौरान अपीलकर्ता द्वारा पीड़िता के स्तनों को दो बार छूना, POCSO Act की धारा 9(l) की शर्तों को पूरा करता है। अभियोजन पक्ष ने पीड़िता की अपनी गवाही के जरिए इसे साबित भी कर दिया। पीड़िता का यह बयान कि अपीलकर्ता ने उसके साथ बार-बार यौन हमला किया, 'गंभीर यौन हमला' (एग्रवेटेड सेक्सुअल असॉल्ट) के अपराध को साबित करता है।"

यह टिप्पणी 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023' (BNSS) की धारा 415(2) के तहत दायर आपराधिक अपील के दौरान की गई। यह अपील पाक्योंग के स्पेशल जज (POCSO) द्वारा 10 जून, 2025 को दिए गए फैसले और 16 जून, 2025 को सुनाई गई सजा के आदेश के खिलाफ थी। इस फैसले में अपीलकर्ता को धारा 9(l) के तहत दोषी ठहराया गया (जिसके लिए POCSO Act की धारा 10 के तहत सजा का प्रावधान है) और उसे पांच साल के कठोर कारावास तथा 2,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई।

अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि 14 दिसंबर, 2023 को जब पीड़िता खाना खा रही थी, तब अपीलकर्ता पीछे से आया। उसने पीड़िता से कहा कि वह स्टोव/हीटर के तार से सावधान रहे, और फिर उसके स्तनों को छुआ और दबाया। जब पीड़िता ने जोर से आवाज लगाई, तो वह पीछे हट गया, लेकिन बाद में उसने फिर से वही हरकत की। पीड़िता ने अपनी मां को इस घटना के बारे में बताया, जिन्होंने आगे उसके पिता को सूचित किया। अगले दिन पिता ने FIR दर्ज कराई।

दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि पीड़िता और उसके माता-पिता के बयानों में कुछ विसंगतियां हैं। ये विसंगतियां इस बात को लेकर थीं कि पीड़िता को किस तरह से छुआ गया, क्या यह हरकत बार-बार की गई और कथित घटना किस समय हुई। उसने यह सवाल भी उठाया कि क्या अभियोजन पक्ष ने पीड़िता का जन्म प्रमाण पत्र जब्त किए जाने को साबित किया। वहीं, अभियोजन पक्ष का कहना था कि 'गंभीर यौन हमले' (एग्रवेटेड सेक्सुअल असॉल्ट) का अपराध बिना किसी उचित संदेह के साबित हो चुका है।

POCSO Act की धारा 7 के तहत 'यौन हमले' के तत्वों की जांच करते हुए हाईकोर्ट ने कहा,

"इसलिए 'यौन हमले' के अपराध का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है - 'छूना' (Touch), जिसके साथ 'यौन इरादा' (Sexual Intent) भी जुड़ा हो।"

'यौन इरादे' के सवाल पर अदालत ने कहा,

"पहली और दूसरी घटना के बीच कुछ समय बीतने के बाद भी अपीलकर्ता द्वारा पीड़िता के स्तनों को बार-बार छूना उसके 'यौन इरादे' को दर्शाता है। घटना के समय आरोपी के कार्यों से उसके 'यौन इरादे' का पता लगाया जा सकता है।"

अदालत ने यह भी पाया कि पीड़िता की गवाही के जरिए मामले के मूल तथ्य साबित हो चुके हैं। साथ ही POCSO Act की धारा 30 के तहत अपीलकर्ता की मानसिक स्थिति के संबंध में जो धारणा (Presumption) बनती है, वह उसके खिलाफ लागू होगी। अदालत ने गौर किया कि अपीलकर्ता ने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो सके कि उसकी ऐसी कोई मानसिक स्थिति नहीं थी या उसका कृत्य निर्दोष था।

बच्चे की गवाही के साक्ष्य मूल्य (Evidentiary Value) के संबंध में अदालत ने कहा,

"यदि विशेष अदालत को गवाही विश्वसनीय, सुसंगत और भरोसेमंद लगती है तो बिना किसी मेडिकल पुष्टि (Medical Corroboration) के भी केवल उस गवाही के आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है।"

अदालत ने पाया कि पीड़िता का बयान पूरी तरह से अडिग, ठोस और सुसंगत था, जिसमें कोई बड़ा बदलाव या विरोधाभास नहीं था। पीड़िता द्वारा अपनी मां को घटना के बारे में बताना और बाद में सामने आए अन्य सबूतों ने भी उसकी गवाही की पुष्टि की।

अपीलकर्ता द्वारा बताई गई विसंगतियों को खारिज करते हुए अदालत ने कहा,

"गवाहों के बयानों में अगर ऐसा कोई अंतर है, जो अभियोजन पक्ष के पूरे मामले को ही खत्म कर दे तो उस पर जरूर ध्यान दिया जाना चाहिए। लेकिन, अगर कोई छोटी-मोटी विसंगतियां हैं जो अलग-अलग कारणों से हो सकती हैं, और वे अभियोजन पक्ष के मुख्य मामले को प्रभावित नहीं करतीं तो उन्हें नजरअंदाज किया जा सकता है। ऐसा न हो कि इन छोटी-छोटी बातों में सच्चाई ही दब जाए।"

जन्म प्रमाण पत्र को लेकर उठाए गए सवाल पर कोर्ट ने कहा कि मूल प्रमाण पत्र रिकॉर्ड पर लाया गया और इसमें दी गई जानकारी की पुष्टि पीड़िता, उसके माता-पिता, जन्म-मृत्यु रजिस्ट्रार और स्कूल के रिकॉर्ड से होती है।

कोर्ट ने माना कि जन्म प्रमाण पत्र एक सार्वजनिक दस्तावेज है, जिसे तब तक सही माना जाएगा, जब तक कि इसे गलत साबित न कर दिया जाए। साथ ही कोर्ट ने पाया कि घटना के समय पीड़िता एक नाबालिग (बच्ची) थी।

दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए कोर्ट ने कहा कि POCSO Act की धारा 10 के तहत गंभीर यौन हमले के लिए कम-से-कम पांच साल की सजा का प्रावधान है। स्पेशल जज ने कानून के अनुसार यही न्यूनतम सजा सुनाई है।

इसके चलते अपील खारिज की गई और दोषसिद्धि तथा सजा बरकरार रखी गई। इसके अलावा, 'सिक्किम पीड़ितों (या उनके आश्रितों) के लिए मुआवजा योजना, 2021' के तहत पीड़िता के लिए अनुशंसित 15,000 रुपये के मुआवजे को भी मंजूरी दी गई।

Case Title : Limbu Manger @ Raju Thapa v. State of Sikkim

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: