सिक्किम हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर व्हीकल एक्ट के तहत मुआवज़े का दावा करने के लिए मृतक के ससुराल पक्ष के भाई-बहनों को 'आश्रित' माना जा सकता है, बशर्ते सबूतों से उनकी आर्थिक निर्भरता साबित हो जाए।

कोर्ट ने कहा कि निर्भरता तय करने का कोई तय नियम नहीं है और हर मामले में फ़ैसला तथ्यों और सबूतों के आधार पर किया जाना चाहिए।

चीफ़ जस्टिस ए. मुहम्मद मुस्ताक ने कहा:

“इसमें कोई शक नहीं कि दावा करने वाले 'कानूनी प्रतिनिधि' (लीगल रिप्रेजेंटेटिव) की परिभाषा में आते हैं। सवाल यह है कि क्या दावा करने वालों को मृतक भाभी/ननद (sister-in-law) पर निर्भर माना जा सकता है। 'निर्भर' (dependent) शब्द को परिभाषित करने के लिए कोई तय नियम नहीं है।”

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला सिक्किम में हुए एक जानलेवा हादसे से जुड़ा है, जिसमें तोरण सुरेश पुनामिया, उनके पति सुरेश पुनामिया और उनके दो नाबालिग बच्चों की मौत हो गई। वे लाचुंग जा रहे थे और उनकी गाड़ी लगभग 700 फीट गहरी खाई में गिर गई। मृतक महिला और उनका परिवार महाराष्ट्र का स्थायी निवासी था और सिक्किम में पर्यटक के तौर पर घूमने गए थे।

इसके बाद मृतक महिला के देवर/ननद (Siblings-in-Law) ने मुआवज़े के लिए दावा याचिका दायर की। गंगटोक के मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने उन्हें ₹85,59,880 का मुआवज़ा दिया, जिस पर दावा याचिका दायर करने की तारीख से 6% सालाना ब्याज भी मिलना था।

बीमा कंपनी ने इस फ़ैसले को चुनौती दी और तर्क दिया कि दावा करने वाले वयस्क और आर्थिक रूप से स्वतंत्र लोग थे, इसलिए उन्हें अपनी भाभी/ननद पर निर्भर नहीं माना जा सकता। कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि मृतक महिला और उनके पति का बिज़नेस दावा करने वालों को विरासत में मिला था, जिसका मतलब है कि निर्भरता का कोई वास्तविक नुकसान नहीं हुआ।

कोर्ट ने माना कि दावा करने वाले, भले ही मृतक महिला के देवर/ननद हैं, मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 166 के तहत “कानूनी प्रतिनिधि” की परिभाषा में आते हैं। कोर्ट ने साफ़ किया कि कानूनी प्रतिनिधि होने के लिए किसी व्यक्ति का कानूनी वारिस होना ज़रूरी नहीं है।

निर्भरता के सवाल पर कोर्ट ने कहा कि इसके लिए कोई तय नियम नहीं है और निर्भरता तथ्यों का सवाल है, जिसे सबूतों के आधार पर तय किया जाना चाहिए। इस मामले में, दावा करने वालों ने साफ़ तौर पर कहा कि वे मृतक महिला और उनके पति द्वारा संयुक्त रूप से चलाए जा रहे बिज़नेस से होने वाली आय पर आर्थिक रूप से निर्भर हैं। उनके सबूतों, जिसमें मृतक महिला का इनकम टैक्स रिटर्न भी शामिल था, से पता चला कि बिज़नेस परिवार की आय का एकमात्र स्रोत है।

कोर्ट ने गौर किया कि बीमा कंपनी ने न तो क्रॉस-एग्जामिनेशन में निर्भरता के दावे को प्रभावी ढंग से चुनौती दी और न ही ऐसे सबूत पेश किए, जिनसे पता चले कि दावा करने वालों की आय के स्वतंत्र स्रोत हैं। ऐसा कोई सबूत भी नहीं है कि मृतक महिला की मौत के बाद दावा करने वालों ने बिज़नेस जारी रखा हो।

इसके अनुसार, कोर्ट ने निर्भरता के नुकसान के फ़ैसले को सही ठहराया और मुआवज़े के फ़ैसले में दखल देने का कोई आधार नहीं पाया।

कोर्ट ने आगे कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 21 के तहत एक साथ हुई मौतों के मामले में लागू होने वाली धारणा को ध्यान में रखते हुए दावा करने वाले मृतक के बच्चों की संपत्ति के उत्तराधिकारी हो सकते हैं, जिसमें माँ की मौत से मिलने वाला मुआवज़ा भी शामिल है।

नतीजतन, हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी की अपील खारिज कर दी और ट्रिब्यूनल द्वारा 6% सालाना ब्याज के साथ ₹85.59 लाख देने का फैसला बरकरार रखा।

Case Name: Branch Manager v/s Hasmukh Pannalal & Ors.

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