खाप पंचायतों पर सख्त रुख: राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य को दिया नीति बनाने का निर्देश, कहा- सामाजिक बहिष्कार मौलिक अधिकारों का उल्लंघन

Update: 2026-04-13 08:08 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने खाप पंचायतों द्वारा जारी फरमानों और सामाजिक बहिष्कार की प्रथा पर गंभीर चिंता जताते हुए राज्य सरकार को व्यापक नीति और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि इस तरह की गतिविधियां नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन हैं।

जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने कहा कि खाप पंचायतें किसी भी प्रकार की वैधानिक संस्था नहीं हैं। फिर भी वे खुद को समानांतर सत्ता केंद्र के रूप में स्थापित कर चुकी हैं और लोगों के निजी जीवन में दखल देकर गैरकानूनी आदेश जारी करती हैं।

अदालत ने कहा,

“सामाजिक बहिष्कार, जबरन जुर्माना और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन है। किसी भी गैर-संवैधानिक संस्था को ऐसे आदेश देने का कोई अधिकार नहीं है।”

हाईकोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि जीवनसाथी चुनने का अधिकार व्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। इसमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप अस्वीकार्य है।

अदालत ने कहा,

“ऑनर किलिंग जैसी घटनाएं इसी सोच का परिणाम हैं। यह पूरी तरह असंवैधानिक है।”

अदालत ने माना कि राज्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए स्पष्ट कानून और व्यवस्था का अभाव है, जिसके कारण ऐसे मामलों में प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पा रही है।

अपने आदेश में हाइकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए—

राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह ऐसी घटनाओं की रोकथाम, निषेध और निवारण के लिए एक व्यापक नीति बनाए। साथ ही एक SOP तैयार की जाए, जिसमें शिकायत मिलने पर त्वरित कार्रवाई, समयबद्ध एफआईआर दर्ज करने, पीड़ितों की सुरक्षा और सहायता जैसे प्रावधान शामिल हों।

अदालत ने जिला स्तर पर नोडल अधिकारी नियुक्त करने, विशेष प्रकोष्ठ बनाने और ऐसे मामलों का केंद्रीकृत डेटा तैयार करने के निर्देश भी दिए। इसके अलावा, लंबित मामलों की निष्पक्ष जांच के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई।

हाईकोर्ट ने शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि खाप पंचायतों को कानून लागू करने या लोगों के मौलिक अधिकारों में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।

अदालत ने राज्य सरकार को यह भी सुझाव दिया कि वह इस मुद्दे पर एक व्यापक कानून बनाने पर विचार करे, जिसमें सामाजिक बहिष्कार और ऐसे फरमानों को स्पष्ट रूप से अपराध घोषित किया जाए।

अंत में हाईकोर्ट ने कहा,

“किसी भी नागरिक को ऐसे गैरकानूनी दबाव या बहिष्कार का शिकार नहीं होना चाहिए। राज्य का दायित्व है कि वह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे।”

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