राजस्थान हाईकोर्ट ने पूर्व विधायकों की पेंशन की संवैधानिक वैधता को सही ठहराया, 1956 के कानून को चुनौती देने वाली PIL खारिज की
राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान विधानसभा (अधिकारियों और सदस्यों का वेतन, भत्ते और पेंशन) अधिनियम, 1956 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की। यह याचिका इस आधार पर दी गई थी कि यह अधिनियम पूर्व विधायकों ("MLAs") को पेंशन लाभ प्रदान करता है।
जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस विनीत कुमार माथुर की डिवीज़न बेंच ने यह टिप्पणी की कि संविधान में पूर्व विधायकों को पेंशन देने के खिलाफ किसी 'निहित रोक' को समझने की याचिकाकर्ता की व्याख्या सही नहीं थी। किसी भी स्पष्ट संवैधानिक सीमा के अभाव में ऐसी किसी रोक का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
पिछली मिसालों में दिए गए फ़ैसले पर ज़ोर देते हुए कोर्ट ने आगे यह बात भी कही:
“एक बार जब संसद की यह क्षमता मान ली गई कि वह सांसदों को पेंशन से जुड़े फ़ायदे देने वाले कानून बना सकती है, और राज्य विधानमंडल को भारत के संविधान के अनुच्छेद 246(3) के साथ पढ़ी जाने वाली सूची II की प्रविष्टि 42 के तहत 'राज्य पेंशन' के संबंध में कानून बनाने की क्षमता मिली हुई है तो जिस कानून को चुनौती दी गई, उसे सिर्फ़ इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि अनुच्छेद 195 में साफ़ तौर पर सिर्फ़ 'वेतन और भत्ते' का ही ज़िक्र है।”
बता दें, कोर्ट जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें ऊपर बताई गई चुनौती उठाई गई। यह तर्क दिया गया कि संविधान का अनुच्छेद 195 सिर्फ़ विधायकों को दिए जाने वाले 'वेतन और भत्ते' की ही बात करता है। इसमें साफ़ तौर पर पेंशन का ज़िक्र नहीं है। संविधान में ऐसी किसी साफ़ मंज़ूरी के अभाव में विधायकों को पेंशन से जुड़े फ़ायदे नहीं दिए जा सकते।
यह भी कहा गया कि पेंशन का सीधा संबंध रिटायरमेंट के फ़ायदों से होता है। आम तौर पर यह नौकरी छोड़ने के बाद ही मिलती है। हालांकि, विधायक का पद संवैधानिक और राजनीतिक पद है, जिस पर रिटायरमेंट का नियम लागू नहीं होता।
इसके विपरीत, राज्य की ओर से यह तर्क दिया गया कि इस मामले में जो मुद्दा उठाया गया, उसे सुप्रीम कोर्ट पहले ही 'लोक प्रहरी (अपने महासचिव एस.एन. शुक्ला और अन्य के ज़रिए) बनाम भारत संघ (अपने सचिव और अन्य के ज़रिए)' मामले में सुलझा चुका है। इस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों के पेंशन के अधिकारों को सही ठहराया और सांसदों की स्थिति भी विधायकों जैसी ही होती है।
दोनों पक्षकारों के तर्कों को सुनने और इस सवाल से जुड़ी दूसरी मिसालों पर विचार करने के बाद कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों को संविधान में साफ़ तौर पर मना नहीं किया गया और जिन्हें जान-बूझकर कानून बनाने वाली संस्था के फ़ैसले के लिए खुला छोड़ दिया गया, वे कानून बनाने वाली संस्था के अधिकार क्षेत्र में आते हैं—बशर्ते कि वे संवैधानिक सीमाओं के अंदर बनाए गए हों।
तदनुसार, याचिका खारिज की गई।
Title: Milap Chand Dandiav v State of Rajasthan