राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि यदि महिला और पुरुष दोनों इस बात से पूरी तरह अवगत हैं कि महिला का पहला विवाह अभी भी कानूनी रूप से कायम है तो सामान्य परिस्थितियों में यह नहीं माना जा सकता कि महिला ने केवल शादी के वादे के आधार पर शारीरिक संबंध के लिए सहमति दी थी।

जस्टिस कुलदीप माथुर ने यह टिप्पणी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(एन) सहित अन्य धाराओं के तहत लगाए गए आरोपों को रद्द करते हुए की।

मामला बीकानेर की एडिशनल सेशन कोर्ट (महिला अत्याचार प्रकरण) के उस आदेश से जुड़ा था, जिसमें आरोपी के खिलाफ धारा 450, 420, 376(2)(एन), 366 और 323 के तहत आरोप तय किए गए। आरोपी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

FIR के अनुसार शिकायतकर्ता का विवाह पहले से एक अन्य व्यक्ति से हुआ था। वैवाहिक घर से अलग होने के बाद वह अपने मायके में रह रही थी। इसी दौरान उसकी आरोपी से मुलाकात हुई और दोनों के बीच करीब दस महीने तक शारीरिक संबंध रहे। महिला का आरोप था कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा कर संबंध बनाए। बाद में उसने आधार कार्ड लेकर शादी कराने के बहाने बुलाया लेकिन वादा पूरा नहीं किया।

आरोपी की ओर से दलील दी गई कि शिकायतकर्ता एक बालिग और समझदार महिला थी, जिसे अपने वैवाहिक दर्जे और अपने निर्णयों के परिणामों की पूरी जानकारी थी। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि उसने केवल शादी के वादे के कारण शारीरिक संबंध बनाए। यह भी कहा गया कि लगभग दस महीने तक संबंध बने रहना इस बात का संकेत है कि संबंध आपसी सहमति से थे।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 376(2)(एन) का संबंध एक ही महिला के साथ अलग-अलग अवसरों पर बार-बार बलात्कार करने से है। इसका अर्थ किसी ऐसे लंबे समय तक चले संबंध से नहीं लगाया जा सकता, जो दोनों की सहमति से बना हो और बाद में विवाद का विषय बन गया हो।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के प्रमोद कुमार नवरत्न बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि पहला विवाह समाप्त हुए बिना दूसरा विवाह कानूनन मान्य नहीं है। इसलिए जब दोनों पक्ष इस तथ्य से परिचित हों कि महिला पहले से विवाहित है तब केवल शादी के वादे के आधार पर सहमति प्राप्त होने का निष्कर्ष निकालना कठिन होता है।

हाईकोर्ट ने कहा,

"इस मामले में यह निर्विवाद है कि शिकायतकर्ता का विवाह ईश्वर राम से हुआ था और संबंधित समय तक तलाक का कोई आदेश नहीं हुआ। ऐसे में कथित शादी का वादा कानूनन तब तक पूरा ही नहीं किया जा सकता था जब तक पहला विवाह विधि के अनुसार समाप्त नहीं हो जाता। इसलिए प्रथम दृष्टया यह नहीं कहा जा सकता कि शिकायतकर्ता की सहमति केवल कानूनी रूप से लागू किए जा सकने वाले शादी के वादे के आधार पर प्राप्त की गई।"

अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता ने लंबे समय तक अपनी इच्छा से आरोपी के साथ शारीरिक संबंध बनाए और FIR तब दर्ज कराई गई, जब दोनों के संबंध खराब हो गए।

इन परिस्थितियों को देखते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने आरोपी की पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए उसके खिलाफ तय किए गए सभी आरोपों से उसे मुक्त किया।

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