बड़ी साजिश का खुलासा होने पर दूसरी FIR दर्ज करना वैध, भले ही जानकारी पहली जांच में मिली हो: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पहली FIR की जांच के दौरान ऐसा नया तथ्य सामने आता है, जिससे किसी अलग आपराधिक गतिविधि, अलग घटना या बड़ी साजिश का खुलासा होता है तो उसके आधार पर दूसरी FIR दर्ज करना पूरी तरह वैध है। केवल इस वजह से कि दूसरी एफआईआर का आधार पहली जांच के दौरान मिला, उसे अवैध नहीं माना जा सकता।
जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू ने यह टिप्पणी करते हुए दूसरी FIR रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज की।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उनके खिलाफ दर्ज दूसरी FIR उसी लेनदेन से संबंधित है, जिसके लिए पहले ही भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 के तहत एफआईआर दर्ज हो चुकी थी। इसलिए दूसरी FIR कानूनन स्वीकार्य नहीं है।
वहीं राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि पहली FIR निजी शिकायत पर दर्ज हुई, जिसमें शिकायतकर्ता ने अपने साथ धोखाधड़ी कर बड़ी रकम ठगे जाने का आरोप लगाया।
राज्य के अनुसार पहली FIR की जांच के दौरान याचिकाकर्ताओं के ठिकानों से ऐसे दस्तावेज और सामग्री मिली, जिनसे पता चला कि मामला केवल एक व्यक्ति से धोखाधड़ी तक सीमित नहीं था बल्कि संगठित साइबर ठगी के बड़े नेटवर्क से जुड़ा हुआ है।
जांच में सामने आया कि याचिकाकर्ता अपनी कंपनी कैपामॉर्फेक्स के जरिए फॉरेक्स ट्रेडिंग के नाम पर लोगों को अधिक मुनाफे का लालच देकर निवेश कराते थे। आरोप है कि निवेशकों से प्राप्त धनराशि को फर्जी कंपनियों और विभिन्न बैंक खातों के माध्यम से घुमाया जाता था और बाद में निकाल लिया जाता था। जांच में वर्चुअल करेंसी और USTD से जुड़े लेनदेन के भी आरोप सामने आए।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि बाद में प्राप्त जानकारी किसी अलग अपराध, अलग आपराधिक गतिविधि या पहले से कहीं बड़ी साजिश का खुलासा करती है, तो दूसरी FIR दर्ज करना पूरी तरह वैध है।
अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया वर्तमान FIR में लगाए गए आरोप पहले दर्ज मामले से कहीं अधिक व्यापक और अलग प्रकृति के हैं। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि दोनों FIR एक ही घटना या एक ही लेनदेन से संबंधित हैं।
हाईकोर्ट ने यह तर्क भी खारिज किया कि पहली FIR वर्ष 2023 की होने के कारण वर्तमान मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) लागू नहीं हो सकती। अदालत ने कहा कि BNS लागू होगी या नहीं, इसका निर्णय इस आधार पर होगा कि वर्तमान FIR में जिन अपराधों का आरोप लगाया गया, वे कब किए गए। यह तथ्य जांच के दौरान एकत्रित सामग्री से तय होगा।
इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने दूसरी FIR को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की।