'जनहित के नाम पर नदी की ज़मीन का स्वरूप नहीं बदला जा सकता': राजस्थान हाईकोर्ट ने मौसमी नदी के तल पर सड़क बनाने की योजना पर राज्य सरकार से सवाल किया
राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से एक मौसमी नदी के तल पर सड़क बनाने के प्रस्ताव पर सवाल किया।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे प्रस्ताव को मंज़ूरी देने से एक ऐसी मिसाल कायम होगी, जिससे राज्य सरकार नदी की ज़मीन का इस्तेमाल सिर्फ़ इसलिए कर सकेगी, क्योंकि यह प्रशासनिक रूप से सुविधाजनक है और इसके लिए ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया की ज़रूरत नहीं है।
डॉ. जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और डॉ. जस्टिस नूपुर भाटी की डिवीज़न बेंच ने कहा कि नदी की ज़मीन एक अलग पर्यावरणीय और पारिस्थितिक संसाधन है। इसका स्वरूप सिर्फ़ इसलिए नहीं बदला जा सकता, क्योंकि प्रस्तावित प्रोजेक्ट जनहित का है।
यह भी बताया गया कि राजस्थान में कई नदियाँ मौसमी या कुछ समय के लिए बहने वाली होती हैं और उनमें साल के कुछ खास समय में ही पानी होता है। लेकिन पानी न दिखने का मतलब यह नहीं है कि नदी के तल के तौर पर उनकी कानूनी या पारिस्थितिक पहचान बदल जाती है।
आगे कहा गया,
"अगर सूखी या मौसमी तौर पर निष्क्रिय नदी के तलों को जन-उपयोगी प्रोजेक्ट्स के लिए खाली ज़मीन माना जाता है तो इस बात का गंभीर डर है कि ऐसी ज़मीनें धीरे-धीरे रेवेन्यू रिकॉर्ड और ज़मीन पर नदी प्रणालियों के तौर पर खत्म हो जाएंगी। ऐसा करने से न सिर्फ़ पर्यावरणीय स्थिरता पर असर पड़ेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए बाढ़ का खतरा, प्राकृतिक जल प्रवाह में रुकावट, भूजल संसाधनों में कमी और प्राकृतिक जल निकासी प्रणालियों का कभी न ठीक होने वाला नुकसान भी हो सकता है।"
बता दें, कोर्ट एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें आरोप लगाया गया कि जिस सड़क को मास्टर प्लान के अनुसार मूल रूप से किसी दूसरी ज़मीन पर बनाया जाना था, उसे अब एक नदी के तल से गुज़ारा जा रहा है।
राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि सड़क एक जन-उपयोगी प्रोजेक्ट है और ऐसे प्रोजेक्ट्स में नदी के हिस्सों को पार करना ज़रूरी होता है।
तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने राज्य सरकार की दलील खारिज की और कहा कि जहां सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे को नदी के हिस्से से गुज़ारना ज़रूरी हो, वहाँ पुल, एलिवेटेड कॉरिडोर आदि जैसे उचित इंजीनियरिंग समाधान अपनाए जाने चाहिए।
राज्य सरकार के नज़रिए के संबंध में कोर्ट ने कहा,
"इस तरह के नज़रिए से राज्य सरकार या स्थानीय निकाय नियोजित विकास और ज़मीन के कानूनी अधिग्रहण से जुड़ी वित्तीय, कानूनी और प्रशासनिक ज़िम्मेदारियों से बच सकेंगे; कानून के शासन से चलने वाली व्यवस्था में ऐसे तरीके को मंज़ूरी नहीं दी जा सकती। अगर इस प्रस्ताव को मान लिया जाता है तो सरकारी अधिकारियों को यह छूट मिल जाएगी कि वे सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज ज़मीन के स्वरूप को नज़रअंदाज़ कर सकें, जब भी उन्हें ऐसा करना सही लगे।”
अदालत ने कहा कि नदियों की सुरक्षा को सिर्फ़ मौजूदा प्रोजेक्ट्स के नज़रिए से नहीं देखा जा सकता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसे प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की बड़ी ज़िम्मेदारी के नज़रिए से भी देखा जाना चाहिए।
इस संदर्भ में, अदालत ने राज्य से इस मुद्दे के समाधान के प्रस्ताव के साथ एक हलफ़नामा और उस समाधान की तकनीकी व्यवहार्यता की जांच करने वाली एक विशेषज्ञ रिपोर्ट जमा करने को कहा।
इस मामले की सुनवाई 4 हफ़्ते बाद होगी।
Title: Pradushan Nivaran And Paryavaran Sanrakshan Samiti & Ors. v State of Rajasthan & Ors.