राजस्थान हाईकोर्ट ने बाल देखरेख संस्थानों में पले-बढ़े और 18 वर्ष की उम्र के बाद वहां से बाहर आने वाले युवाओं यानी केयर लीवर्स के पुनर्वास और उनके अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण अंतरिम निर्देश जारी किए।

जस्टिस अनूप कुमार ढांड की पीठ ने केंद्र और राज्य सरकार को केयर लीवर्स के लिए सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश और सभी श्रेणियों की सरकारी सेवाओं में 1 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण देने की व्यापक नीति 12 सप्ताह में अधिसूचित करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा कि बाल देखरेख संस्थानों से निकलने वाले अनेक युवा 18 वर्ष की उम्र पूरी करते ही बिना स्थायी पहचान, आवास और पर्याप्त सहयोग के अचानक सामान्य जीवन में प्रवेश कर जाते हैं। ऐसे युवाओं के सामने शिक्षा, रोजगार, आवास और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी गंभीर चुनौतियां होती हैं।

मामले में कोर्ट ने किशोर न्याय अधिनियम की धारा 15 के तहत होने वाले प्रारंभिक आकलन में गंभीर कमियों पर भी चिंता जताई। धारा 15 के तहत 16 वर्ष से अधिक उम्र के ऐसे बच्चे, जिन पर जघन्य अपराध का आरोप है, उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता तथा अपराध के परिणामों को समझने की क्षमता का प्रारंभिक आकलन किया जाता है। इसका उद्देश्य यह तय करने में सहायता करना है कि मामले में बच्चे के साथ वयस्क के रूप में मुकदमे की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए या नहीं।

हाईकोर्ट ने पाया कि कई मामलों में यह आकलन वास्तविक प्रक्रिया के अनुरूप करने के बजाय औपचारिक और यांत्रिक तरीके से किया जा रहा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं स्नायु विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का कई मामलों में पालन नहीं किया जा रहा है।

कोर्ट के अनुसार, कई मामलों में घटना के महीनों बाद तक किशोर को प्रारंभिक आकलन के लिए नहीं भेजा जाता। कुछ मामलों में अस्पताल में कई दिनों तक रखने के बाद केवल पहले से तैयार प्रारूप में औपचारिक रूप से जानकारी भरकर रिपोर्ट तैयार कर दी जाती है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया,

“प्रारंभिक आकलन का उद्देश्य यह तय करना नहीं है कि बच्चे ने अपराध किया है या नहीं, बल्कि उसकी मानसिक परिपक्वता का आकलन करना है।”

हाईकोर्ट ने राज्य के प्रत्येक जिले में नैदानिक मनोवैज्ञानिकों, मनोचिकित्सकों और बाल मनोविज्ञान के विशेषज्ञों का पैनल गठित करने का निर्देश दिया है। यह पैनल किशोरों के प्रारंभिक आकलन की प्रक्रिया में विशेषज्ञ सहायता देगा। राज्य सरकार को छह सप्ताह के भीतर पैनल गठित करना होगा। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब तक प्रारंभिक आकलन राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं स्नायु विज्ञान संस्थान द्वारा निर्धारित प्रारूप के अनुसार नहीं किया जाता, तब तक किशोर न्याय बोर्ड ऐसी रिपोर्ट स्वीकार नहीं करेगा।

चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के निदेशक तथा सवाई मानसिंह चिकित्सा महाविद्यालय, जयपुर के प्राचार्य को पैनल के सदस्यों के लिए 60 दिनों के भीतर अनिवार्य प्रशिक्षण और संवेदनशीलता कार्यक्रम आयोजित करने का भी निर्देश दिया गया।

केयर लीवर्स के संबंध में कोर्ट ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग को व्यापक पुनर्वास और देखरेख के बाद की नीति तैयार करने का निर्देश दिया। परिवार का सहयोग नहीं रखने वाले प्रत्येक केयर लीवर को 18 वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद एक वर्ष तक रहने की व्यवस्था, पढ़ाई जारी रखने में सहायता, व्यावसायिक प्रशिक्षण, परामर्श और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने को कहा गया।

कोर्ट ने कहा कि बाल देखरेख संस्थानों में पले-बढ़े हजारों युवा 18 वर्ष की उम्र में बाहर आने के बाद बिना पर्याप्त सहारे के जीवन शुरू करते हैं। ऐसे युवाओं के पास स्थायी पहचान, स्थायी पता, आवास या भरोसेमंद सहायता तंत्र नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि उनकी असुरक्षा उनकी क्षमता की कमी के कारण नहीं, बल्कि आवश्यक सहयोग के अभाव के कारण है।

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रत्येक केयर लीवर को आवश्यक पहचान दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं और इसके लिए प्रक्रिया उसके 17.5 वर्ष की उम्र पूरी करने से पहले ही शुरू कर दी जाए। प्रत्येक केयर लीवर के लिए व्यक्तिगत पुनर्वास योजना भी तैयार करनी होगी। यह योजना 18 वर्ष की उम्र पूरी करने के तीन महीने के भीतर तैयार की जानी होगी।

कोर्ट ने केयर लीवर्स को सरकारी संस्थानों में स्नातक तक निशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने और इसके लिए शिक्षा एवं छात्रवृत्ति कोष बनाने का निर्देश दिया। उच्च शिक्षा के लिए कम-से-कम 4,000 रुपये मासिक और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए 6,000 रुपये मासिक छात्रवृत्ति देने तथा छात्रावास की सुविधा उपलब्ध कराने को कहा गया।

इसके अलावा स्वरोजगार, नया व्यवसाय शुरू करने और आवास के लिए 5 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता या ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए गए।

जब तक 1 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण की व्यापक नीति तैयार नहीं हो जाती, तब तक राज्य सरकार को सभी सरकारी चयन प्रक्रियाओं में केयर लीवर्स को पांच वर्ष की आयु में छूट देने तथा आवेदन और परीक्षा शुल्क से मुक्त रखने का निर्देश दिया गया।

कोर्ट ने केयर लीवर्स के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर सचिवालय स्थापित करने का भी निर्देश दिया। ये सचिवालय उनके लिए समन्वय और शिकायत निवारण की व्यवस्था के रूप में काम करेंगे। राज्य सरकार को 30 दिनों के भीतर राज्य किशोर न्याय परिषद गठित करने को कहा गया। परिषद प्रारंभिक आकलन की प्रक्रिया और प्रारूप को मानकीकृत करने के साथ मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों की योग्यता, प्रशिक्षण और पैनल में शामिल किए जाने की प्रक्रिया तय करेगी।

इसके अलावा, राज्य के प्रत्येक राजस्व संभाग में किशोर न्याय आयोग गठित करने का निर्देश दिया गया। इसका उद्देश्य बच्चे, उसके परिवार और राज्य के बीच समन्वय कर पुनर्वास सुनिश्चित करना होगा, ताकि किसी केयर लीवर को बिना पुनर्वास योजना के बाल देखरेख व्यवस्था से बाहर न किया जाए।

मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी।

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