राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी किराये की संपत्ति में होटल, दुकान, कार्यालय या अन्य व्यावसायिक गतिविधि संचालित होने मात्र से मकान मालिक और किरायेदार के बीच उत्पन्न विवाद स्वतः वाणिज्यिक विवाद नहीं बन जाता। यदि विवाद मूलतः किरायेदारी, किराया, पट्टे की अवधि, समय से पहले पट्टा समाप्त करने अथवा किरायेदार को बेदखल करने से संबंधित है तो ऐसे विवाद की सुनवाई राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001 के तहत गठित किराया अधिकरण के अधिकार क्षेत्र में ही होगी।

जस्टिस फरजंद अली ने एम/एस श्री विनायक होटल्स एंड रिसॉर्ट्स बनाम डेजर्ट ट्यूलिप होटल एंड रिसॉर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य, एस.बी. सिविल रिट याचिका संख्या 18805/2024 में 13 अगस्त 2026 को यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।

चार साल 11 महीने के लिए हुआ था पंजीकृत पट्टा

मामले के अनुसार श्री विनायक होटल्स एंड रिसॉर्ट्स ने डेजर्ट ट्यूलिप होटल एंड रिसॉर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड से 10 अगस्त 2022 को पंजीकृत पट्टा करार किया था। यह पट्टा 1 सितंबर 2022 से 1 अगस्त 2027 तक यानी चार साल 11 महीने के लिए था। वार्षिक किराया 50 लाख रुपये निर्धारित था। याचिकाकर्ता ने परिसर में होटल संचालित करने के लिए करीब 2 करोड़ रुपये खर्च करने का दावा किया था। किराया त्रैमासिक अग्रिम रूप से दिया जाना था और याचिकाकर्ता के अनुसार वह नियमित रूप से किराया एवं जीएसटी का भुगतान कर रहा था।

किराया दोगुना करने की मांग के बाद बढ़ा विवाद

याचिकाकर्ता के अनुसार अप्रैल 2024 में प्रतिवादी पक्ष की ओर से वार्षिक किराया 50 लाख से बढ़ाकर एक करोड़ रुपये करने का दबाव बनाया गया। याचिकाकर्ता ने पंजीकृत पट्टा करार का हवाला देते हुए यह मांग स्वीकार नहीं की। इसके बाद 13 मई 2024 को नोटिस तथा 15 मई और 18 मई को ई-मेल/अन्य नोटिस जारी किए गए।याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उसे परिसर खाली करने और बेदखल करने का दबाव बनाया गया। इसके बाद उसने राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम की धारा 18 के तहत जैसलमेर किराया अधिकरण में याचिका दायर कर कानून की प्रक्रिया के बिना बेदखली से संरक्षण मांगा। किराया अधिकरण ने 26 जून 2024 को अंतरिम आदेश जारी कर प्रतिवादियों को कानून के अनुसार प्रक्रिया अपनाए बिना याचिकाकर्ता को बेदखल करने से रोक दिया था।

किराया अधिकरण ने कहा—मामला वाणिज्यिक न्यायालय में चलेगा

इसके बाद मकान मालिक पक्ष ने सीपीसी के आदेश 7 नियम 11 के तहत आवेदन देकर कहा कि होटल परिसर का इस्तेमाल पूर्णतः व्यापार एवं वाणिज्य के लिए हो रहा है, इसलिए विवाद वाणिज्यिक न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता है। किराया अधिकरण ने 2 अगस्त 2024 को यह आपत्ति स्वीकार कर ली और धारा 18 के तहत दायर याचिका वापस करते हुए उसे सक्षम वाणिज्यिक न्यायालय के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया। किराया अपीलीय अधिकरण, जैसलमेर ने भी 23 अक्टूबर 2024 को अपील खारिज करते हुए इस आदेश को बरकरार रखा।

हाईकोर्ट ने पलटा दोनों अधिकरणों का फैसला

हाईकोर्ट ने दोनों आदेशों को रद्द करते हुए कहा कि राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001 एक विशेष एवं संरक्षणात्मक कानून है। इसकी धारा 18(1) किरायेदार-मकान मालिक के विवादों के संबंध में किराया अधिकरण को विशेष अधिकार क्षेत्र देती है, जबकि धारा 29 इस अधिनियम को अन्य असंगत कानूनों पर प्रभावी बनाती है। कोर्ट ने कहा कि इस कानून में व्यावसायिक उपयोग वाली संपत्तियों को भी स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। अधिनियम की धारा 2(एफ) में आवासीय उपयोग के साथ-साथ वाणिज्यिक उपयोग के लिए दी गई संपत्ति को भी “premises” की परिभाषा में शामिल किया गया है। इसलिए यह कहना कि संपत्ति का व्यावसायिक उपयोग होने के कारण वह किराया नियंत्रण कानून के दायरे से बाहर हो जाती है, कानून की अपनी योजना के विपरीत होगा।

वाणिज्यिक न्यायालय की शक्ति पर भी धारा 11 की रोक

न्यायालय ने वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 की धारा 11 को भी महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि धारा 11 स्वयं ऐसे मामलों में वाणिज्यिक न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को सीमित करती है, जहां किसी अन्य कानून के तहत सिविल न्यायालय का अधिकार क्षेत्र स्पष्ट रूप से या निहित रूप से प्रतिबंधित है। हाईकोर्ट ने कहा कि राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम की धारा 18(1) और 29 मिलकर ऐसा ही विशेष अधिकार क्षेत्र किराया अधिकरण को प्रदान करती हैं। इसलिए केवल इस आधार पर कि संपत्ति का उपयोग होटल व्यवसाय के लिए हो रहा है, वाणिज्यिक न्यायालय को अधिकार क्षेत्र नहीं दिया जा सकता।

“किरायेदार क्या व्यवसाय करता है” नहीं, “विवाद किस अधिकार से पैदा हुआ” महत्वपूर्ण

फैसले की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी में हाईकोर्ट ने कहा कि अधिकार क्षेत्र तय करने के लिए यह देखना होगा कि वास्तविक विवाद क्या है और उसके मूल में कौन-सा कानूनी संबंध है। कोर्ट ने होटल व्यवसाय और पट्टे के संबंध के बीच स्पष्ट अंतर किया। याचिकाकर्ता होटल चला रहा है, लेकिन मकान मालिक ने उसे होटल व्यवसाय का प्रबंधन सौंपने का समझौता नहीं किया था। उसे केवल एक निश्चित अवधि के लिए अचल संपत्ति किराये पर दी गई थी और बदले में किराया लिया जा रहा था। इसलिए विवाद का मूल होटल व्यवसाय नहीं बल्कि मकान मालिक-किरायेदार का संबंध था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई समझौता होटल के संयुक्त संचालन, लाभ-हानि के बंटवारे, प्रबंधन, कर्मचारियों, राजस्व अथवा होटल व्यवसाय के व्यावसायिक संचालन को नियंत्रित करने से संबंधित होता, तो मामला अलग हो सकता था। लेकिन वर्तमान मामले में ऐसा कोई संयुक्त व्यावसायिक उपक्रम नहीं था।

हर दुकान, कार्यालय और रेस्तरां पर भी यही सिद्धांत लागू होगा

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि यह मान लिया जाए कि किराये की संपत्ति में व्यावसायिक गतिविधि होने मात्र से हर विवाद वाणिज्यिक न्यायालय में चला जाएगा, तो इसका परिणाम यह होगा कि दुकान, कार्यालय, रेस्तरां, कारखाना, गोदाम, शोरूम, क्लिनिक, कोचिंग सेंटर और कार्यशाला जैसी लगभग हर व्यावसायिक किरायेदारी किराया अधिकरण के दायरे से बाहर हो जाएगी। कोर्ट ने ऐसी व्याख्या को स्वीकार करने से इनकार किया और कहा कि इससे राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम में व्यावसायिक किरायेदारों को दी गई वैधानिक सुरक्षा ही निष्प्रभावी हो जाएगी।

विवाद का केंद्र था समय से पहले पट्टा समाप्त करना

हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में होटल के संचालन, ग्राहकों, रसोई, कर्मचारियों, विपणन अथवा होटल की आय को लेकर कोई विवाद नहीं था। असली विवाद यह था कि क्या मकान मालिक पंजीकृत पट्टा करार की निर्धारित अवधि समाप्त होने से पहले उसे समाप्त कर सकता है और किरायेदार को परिसर से बेदखल कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि यह विवाद किराया, पट्टे की अवधि, समाप्ति और कब्जे से जुड़ा हुआ है और इसलिए मूल रूप से किरायेदारी विवाद है।

सुप्रीम कोर्ट के 'अंबालाल सराभाई' फैसले को भी अलग माना

प्रतिवादी पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के Ambalal Sarabhai Enterprises Ltd. v. K.S. Infraspace LLP फैसले पर भरोसा किया था। हाईकोर्ट ने कहा कि वह निर्णय वर्तमान मामले पर सीधे लागू नहीं होता, क्योंकि उस मामले में राजस्थान जैसे विशेष किराया नियंत्रण कानून के तहत मकान मालिक-किरायेदार संबंध और किराया अधिकरण का विशेष अधिकार क्षेत्र मौजूद नहीं था। इसलिए Ambalal Sarabhai के सिद्धांत को इस हद तक नहीं बढ़ाया जा सकता कि केवल व्यावसायिक उपयोग के आधार पर विशेष किराया कानून द्वारा दिए गए अधिकार क्षेत्र को समाप्त कर दिया जाए।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

न्यायमूर्ति फरजंद अली ने 2 अगस्त 2024 के जैसलमेर किराया अधिकरण के आदेश तथा 23 अक्टूबर 2024 के किराया अपीलीय अधिकरण के फैसले को रद्द कर दिया। धारा 18 के तहत दायर मूल किराया प्रकरण संख्या 10/2024 को पुनः जैसलमेर किराया अधिकरण के रिकॉर्ड पर बहाल कर दिया गया और अधिकरण को मामले की सुनवाई गुण-दोष के आधार पर कानून के अनुसार करने का निर्देश दिया गया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके द्वारा अधिकार क्षेत्र के प्रश्न पर की गई टिप्पणियां मामले के गुण-दोष को प्रभावित नहीं करेंगी। साथ ही, 26 जून 2024 को किराया अधिकरण द्वारा दिया गया अंतरिम संरक्षण भी जारी रखने का आदेश दिया गया। इसके तहत प्रतिवादी पक्ष अंतिम निर्णय होने तक याचिकाकर्ता को कानून की प्रक्रिया के अलावा अन्य किसी तरीके से बेदखल नहीं कर सकेगा। रिट याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने कोई हर्जाना अधिरोपित नहीं किया।

Case Title: M/s Shree Vinayak Hotels & Resorts through Partner/Authorized Signatory Sanjay Sethi Vs. Desert Tulip Hotel & Resorts Pvt. Ltd. & Ors. S.B. Civil Writ Petition No. 18805/2024

रजाक खान हैदर @ लाइव लॉ नेटवर्क

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