गलत अर्ध-न्यायिक आदेश देना अकेले कदाचार नहीं, दुर्भावना या भ्रष्ट मंशा जरूरी: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक रिटायर राजस्थान प्रशासनिक सेवा अधिकारी के खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही और उनकी पेंशन स्थायी रूप से रोकने की सजा रद्द की।
अधिकारी पर आरोप था कि उन्होंने किरायेदारी विवाद से जुड़े मामले में गलत आदेश पारित किया और अपने अधिकार क्षेत्र का अनुचित इस्तेमाल किया। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल किसी अर्ध-न्यायिक आदेश के गलत या कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण पाए जाने से अधिकारी का कृत्य कदाचार नहीं बन जाता।
जस्टिस मुकेश राजपुरोहित ने कहा कि न्यायिक या अर्ध-न्यायिक अधिकारों का इस्तेमाल करने वाले अधिकारी के खिलाफ केवल इसलिए अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती क्योंकि बाद में किसी अन्य प्राधिकारी ने कानून की अलग व्याख्या की या उसके फैसले को गलत माना। इसके लिए लापरवाही की गंभीरता, दुर्भावना, भ्रष्ट उद्देश्य या बेईमान मंशा जैसे तत्वों का होना आवश्यक है।
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे और वर्ष 2001 में चूरू में उप निदेशक के पद पर कार्यरत थे। वर्ष 2002 में उन्होंने राजस्थान काश्तकारी अधिनियम के तहत एक मामले में एक व्यक्ति के पक्ष में आदेश पारित किया था।
रिटायरमेंट के दिन वर्ष 2017 में उन्हें आरोपपत्र जारी किया गया। इसमें आरोप लगाया गया कि वर्ष 2002 में उनके द्वारा पारित आदेश गलत था। इसके बाद उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई, जो अंततः उनकी पूरी पेंशन स्थायी रूप से रोकने की सजा में बदल गई। इसके खिलाफ अधिकारी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।
अधिकारी की ओर से दलील दी गई कि संबंधित आदेश उन्होंने अर्ध-न्यायिक कार्य का निर्वहन करते हुए पारित किया और आदेश देने से पहले रिकॉर्ड पर मौजूद सभी पक्षों की दलीलों और सामग्री पर विचार किया गया। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार, दुर्भावना, बेईमानी या किसी अवैध गतिविधि का कोई आरोप नहीं था।
यह भी बताया गया कि संबंधित आदेश को चुनौती देने के लिए न तो कोई अपील दाखिल की गई और न ही पुनरीक्षण याचिका दायर की गई। इसके बावजूद करीब 15 वर्ष बाद रिटायमेंट के समय उनके खिलाफ कारण बताओ नोटिस और अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई।
राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि अधिकारी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर संबंधित व्यक्ति को ऐसी भूमि पर खातेदारी अधिकार प्रदान कर दिए थे जिसे सरकारी रिकॉर्ड में गोचर भूमि के रूप में दर्ज किया गया। राज्य का तर्क था कि यह केवल न्यायिक निर्णय में हुई गलती नहीं बल्कि गंभीर लापरवाही थी।
राज्य ने यह भी दलील दी कि केवल इस आधार पर कि अधिकारी के खिलाफ दुर्भावना या भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है। उन्हें कदाचार से मुक्त नहीं माना जा सकता।
राज्य के अनुसार सेवा कानून के तहत गंभीर लापरवाही या वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन भी अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए पर्याप्त हो सकता है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि पूरी अनुशासनात्मक कार्यवाही मूल रूप से उसी आदेश पर आधारित थी, जिसे चुनौती देने के लिए किसी सक्षम मंच के समक्ष कोई अपील या पुनरीक्षण दाखिल नहीं किया गया। अदालत ने यह भी पाया कि अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार, दुर्भावना, बेईमानी या अवैध लाभ लेने जैसे किसी कृत्य का आरोप नहीं था।
हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित आदेश कारणों पर आधारित था और उसमें रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री पर विचार किया गया। ऐसी स्थिति में अनुशासनात्मक कार्यवाही के जरिए वर्षों पहले दिए गए अर्ध-न्यायिक आदेश की वैधता और शुद्धता की दोबारा जांच करना उचित नहीं है।
कोर्ट ने कहा,
“दुर्भावना, भ्रष्टाचार या बेईमान मंशा के किसी आरोप के अभाव में अनुशासनात्मक कार्यवाही के माध्यम से अर्ध-न्यायिक आदेश की इस तरह की अप्रत्यक्ष जांच सेवा कानून के तहत पूरी तरह अस्वीकार्य है।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी अर्ध-न्यायिक निर्णय का गलत होना अपने आप में कदाचार नहीं माना जा सकता। अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए रिकॉर्ड पर लापरवाही, अनुचित उद्देश्य या दुर्भावना जैसे ठोस तत्व होने चाहिए। इस मामले में ऐसा कोई आधार सामने नहीं आया।
अदालत ने अनुशासनात्मक कार्यवाही में कुछ प्रक्रियात्मक खामियां भी पाईं। इसके अलावा कार्यवाही शुरू करने में हुई करीब 15 वर्ष की असाधारण देरी पर भी राज्य की ओर से कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही और लगाई गई सजा रद्द की। अदालत ने राज्य सरकार को उनकी पेंशन बहाल करने और दो महीने के भीतर उसका भुगतान करने का निर्देश दिया।