शैक्षणिक सत्र के बीच शिक्षकों के सामूहिक तबादले मनमाने और शिक्षा व्यवस्था के लिए घातक: राजस्थान हाइकोर्ट

Update: 2026-01-10 13:44 GMT

राजस्थान हाइकोर्ट ने एक सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल के स्थानांतरण पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि शैक्षणिक सत्र के बीच में इस तरह के सामूहिक तबादले न केवल मनमाने हैं, बल्कि यह पूरी शिक्षा व्यवस्था को भी अस्त-व्यस्त कर देते हैं।

जस्टिस अशोक कुमार जैन ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि सितंबर के महीने में किए गए ये तबादले स्टूडेंट्स की पढ़ाई में बाधा डालते हैं और प्रशासनिक संवेदनशीलता की कमी को दर्शाते हैं।

सुशासन के सिद्धांतों के खिलाफ है यह कदम

अदालत ने इन तबादलों को सुशासन के सिद्धांतों के विपरीत माना है। जस्टिस जैन ने अपनी टिप्पणी में कहा कि सरकार से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह शैक्षणिक सत्र के मध्य में जब सत्र समाप्त होने में केवल छह महीने बचे हों, इतने बड़े पैमाने पर शिक्षकों का तबादला करे। इस तरह के कदमों का सीधा असर उन स्टूडेंट्स के भविष्य और उन अभिभावकों की आशाओं पर पड़ता है, जो अपने बच्चों के लिए निजी स्कूलों का खर्च वहन नहीं कर सकते। कोर्ट ने तल्ख लहजे में यह भी कहा कि संभवतः इसी अव्यवस्था के कारण उच्च सरकारी अधिकारी या संपन्न लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों के बजाय निजी स्कूलों में भेजते हैं।

ट्रिब्यूनल की कार्यप्रणाली पर तल्ख टिप्पणी

हाइकोर्ट ने इस मामले में राजस्थान सिविल सेवा अपील अधिकरण (ट्रिब्यूनल) के रवैये की भी कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने समान मामलों में अलग-अलग राहत प्रदान की और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का अपनी सुविधा के अनुसार चयनात्मक उपयोग किया। अदालत ने इसे 'न्यायिक बेईमानी' और 'दुर्भावनापूर्ण दृष्टिकोण' बताते हुए कहा कि ट्रिब्यूनल को योग्यता के आधार पर मामलों का निपटारा करना चाहिए। बेंच ने कार्मिक विभाग को यह सुझाव भी दिया कि ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष और सदस्यों को उचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की पक्षपातपूर्ण स्थितियों से बचा जा सके।

राजनीतिक दबाव और शिक्षा नीति का उल्लेख

अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि सितंबर, 2025 में किए गए इस व्यापक फेरबदल में 4,527 प्रिंसिपल्स का तबादला किया गया। याचिकाकर्ता का मामला विशेष रूप से गंभीर था क्योंकि उसे मात्र 5 महीने के भीतर ही वर्तमान स्थान से 500 किलोमीटर दूर भेज दिया गया। कोर्ट ने कहा कि शिक्षकों के तबादले सामान्यतः गर्मियों की छुट्टियों में होने चाहिए। हाइकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक दबाव या स्थानीय नेताओं के प्रभाव में शिक्षकों का स्थानांतरण करना एक गलत परंपरा बन गई।

अदालत ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का हवाला देते हुए कहा कि इसे तभी सही मायने में लागू किया जा सकता है, जब राज्य के प्रशासक संवेदनशीलता दिखाएं। शिक्षक जमीनी स्तर पर भविष्य की पीढ़ी तैयार करने का काम करते हैं और उन्हें प्रशासकों की सनक का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए। अंत में हाइकोर्ट ने प्रिंसिपल के तबादला आदेश को रद्द कर दिया और ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया कि वह दो महीने के भीतर इस अपील पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय ले।

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