CrPC की धारा 311 | वकील की बीमारी के कारण अभियुक्त को जिरह से वंचित नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाइकोर्ट

Update: 2026-01-13 10:48 GMT

राजस्थान हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल अभियुक्त के वकील की बीमारी और तय तारीख पर अदालत में उपस्थित न हो पाने के कारण अभियुक्त को अभियोजन गवाहों से क्रॉस-एग्ज़ामिनेशन के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि जिरह करना अभियुक्त का वैधानिक अधिकार है और निष्पक्ष सुनवाई के लिए यह अवसर देना अनिवार्य है।

यह फैसला जस्टिस अनूप कुमार ढांद की पीठ ने उस याचिका पर सुनाया, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा अभियुक्त की क्रॉस एक्जामिनेशन का अवसर बंद किए जाने और CrPC की धारा 311 के तहत दायर आवेदन को खारिज किए जाने को चुनौती दी गई।

मामले के तथ्य यह थे कि अभियुक्त पर बार-बार बलात्कार का आरोप है। अभियोजन गवाहों के बयान दर्ज होने के पहले दिन अभियुक्त के वकील बीमारी के कारण अदालत में उपस्थित नहीं हो सके। इस कारण एक आवेदन देकर अनुरोध किया गया कि गवाहों से क्रॉस एग्जामिनेशन के लिए कोई अन्य तिथि दी जाए। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने इस आवेदन को खारिज कर दिया और अभियुक्त की क्रॉस एग्जामिनेशन का अवसर बंद कर दिया। इसके बाद अभियुक्त ने CrPC की धारा 311 के तहत गवाहों को पुनः बुलाने का आवेदन दिया, जिसे भी ट्रायल कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया। इसी आदेश के खिलाफ हाइकोर्ट का रुख किया गया।

हाइकोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि क्रॉस एग्जामिनेशन अभियुक्त का एक महत्वपूर्ण वैधानिक अधिकार है। अदालत ने कहा कि जब तक अभियुक्त को गवाहों से क्रॉस एग्जामिनेशन का अवसर नहीं दिया जाता, तब तक वह अपना बचाव प्रभावी ढंग से प्रस्तुत नहीं कर सकता। निष्पक्ष ट्रायल के लिए अभियुक्त को उचित अवसर देना आवश्यक है, लेकिन इस मामले में उसे इस अधिकार से वंचित कर दिया गया।

अदालत ने CrPC की धारा 311 के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह धारा अदालतों को अत्यंत व्यापक अधिकार प्रदान करती है, जिसके तहत किसी भी चरण पर किसी भी गवाह को बुलाया जा सकता है, पुनः बुलाया जा सकता है या दोबारा जाँच की जा सकती है, यदि यह न्यायपूर्ण निर्णय के लिए आवश्यक हो। हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस शक्ति का प्रयोग न्यायिक विवेक, सावधानी और सतर्कता के साथ किया जाना चाहिए।

हाइकोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 311 में “किसी भी” जैसे शब्दों का प्रयोग यह दर्शाता है कि यदि अदालत को यह संतुष्टि हो जाए कि किसी गवाह की पुनः जाँच या पुनः बुलाना मामले के न्यायोचित निर्णय के लिए आवश्यक है, तो ऐसा किया जाना चाहिए। इस मामले में अभियोजन गवाहों को दोबारा बुलाना निष्पक्ष और न्यायपूर्ण निर्णय के लिए आवश्यक था।

इन परिस्थितियों में हाइकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया और निर्देश दिया कि अभियोजन गवाहों को पुनः समन जारी कर अभियुक्त को उनसे क्रॉस एग्जामिनेशन का पूरा अवसर दिया जाए।

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