मनगढ़ंत मामला, सह-आरोपी बरी; पीड़िता से जोड़ने वाला एक भी कॉल नहीं: आसाराम की राजस्थान हाइकोर्ट में दलील

Update: 2026-02-25 09:40 GMT

स्वयंभू संत आसाराम बापू की सजा के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट में बचाव पक्ष ने अभियोजन गवाहों, खासकर पीड़िता के माता-पिता की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए।

बचाव पक्ष ने कहा कि उनके बयानों में विरोधाभास बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बातें और झूठे दावे हैं, जो पूरे मामले की जड़ को कमजोर करते हैं।

डिवीजन बेंच के जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित के समक्ष बचाव पक्ष ने दलील दी कि पीड़िता के माता-पिता को अपीलकर्ता की गतिविधियों की पूरी जानकारी थी और उन्हें यह भी पता था कि वह संबंधित समय पर जोधपुर में थे।

क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान मां ने स्वीकार किया कि पिता पहले यह पता करते थे कि संत कहां सत्संग कर रहे हैं, उसके बाद ही यात्रा करते थे।

पीठ ने जब इसे सामान्य दलील बताते हुए विशिष्टता पूछी, तो बचाव पक्ष ने कहा कि साक्ष्यों को समग्र रूप से पढ़ने पर हर चरण पर दो संभावित संस्करण सामने आते हैं। ऐसे में ट्रायल कोर्ट को दोषसिद्धि नहीं करनी चाहिए।

बचाव पक्ष की एक प्रमुख दलील कथित सहायक शिवा से जुड़ी थी। अभियोजन के अनुसार दिल्ली पहुंचने पर माता-पिता ने शिवा से कई बार संपर्क किया।

हालांकि, बचाव पक्ष ने कॉल विवरण रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि शिवा को एक भी आउटगोइंग कॉल नहीं किया गया। यदि वे कहते हैं कि बार-बार फोन किया तो रिकॉर्ड में एक भी कॉल क्यों नहीं है।

अदालत ने पूछा कि शिवा ने अपने बयान में क्या कहा। इस पर बताया गया कि शिवा को ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि केवल अपीलकर्ता को जोड़ने के लिए शिवा का नाम लिया गया।

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि माता-पिता के बयानों में घटनाक्रम को लेकर विरोधाभास है। मां का कहना था कि दिल्ली पहुंचने के बाद शिवा से संपर्क किया गया जबकि पिता ने कहा कि जोधपुर रेलवे स्टेशन पर शिवा ने पहले फोन किया। इन बदलते बयानों से स्पष्ट है कि कहानी गढ़ी गई।

वकील ने कहा,

“यदि अभियोजन गवाह हर चरण पर अलग कहानी बताते हैं तो उनकी गवाही को सावधानी से देखा जाना चाहिए। पूरा मामला बाद में गढ़ी गई कहानी पर आधारित है।”

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 370 (मानव तस्करी) के आरोप पर भी बचाव पक्ष ने आपत्ति जताई। उनका कहना था कि पीड़िता और उसका परिवार स्वयं यात्रा कर रहे थे, इसमें न तो कोई अवैध परिवहन, न छिपाने का कृत्य और न ही विधिक अर्थ में आश्रय देने की स्थिति बनती है।

वकील ने कहा कि आश्रय'₹ का अर्थ किसी को गिरफ्तारी से बचाने के लिए शरण देना होता है न कि धार्मिक या आध्यात्मिक संपर्क।

हालांकि पीठ ने कहा कि कथित झाड़-फूंक की प्रक्रिया के दौरान ठहराना संदर्भ में आश्रय माना जा सकता है लेकिन बचाव पक्ष ने इस व्याख्या से असहमति जताई।

बचाव पक्ष ने साजिश के आरोप को भी चुनौती दी। उनका कहना था कि जब सह-आरोपी बरी हो चुके है तो साजिश की कड़ी टूट जाती है।

वकील ने कहा,

“कोई व्यक्ति खुद से साजिश नहीं कर सकता।"

उन्होंने यह भी कहा कि कई महत्वपूर्ण गवाहों को पेश नहीं किया गया और अदालत के निर्देश के बावजूद कुछ कॉल रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किए गए।

पीड़िता की बाद की गतिविधियों, विशेषकर एक पूर्व शिक्षक से मोबाइल पर बातचीत को भी अभियोजन ने सामने नहीं रखा।

सुनवाई के दौरान पीठ ने बचाव पक्ष को गवाही के अंशों को संदर्भ से बाहर पढ़ने से बचने की सलाह दी।

अदालत ने संकेत दिया कि अंतिम निर्णय इस बात पर निर्भर करेगा कि विरोधाभास कितने महत्वपूर्ण हैं और क्या वे मामले की जड़ पर असर डालते हैं।

मामले की सुनवाई आंशिक रूप से पूरी हुई है और अगली तारीख पर आगे की दलीलें सुनी जाएंगी।

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