गरीबी जमानत के अधिकार में बाधा नहीं बन सकती, जमानतदार न मिलने पर आरोपी को जेल में नहीं रखा जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि किसी आरोपी को केवल इस वजह से अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता कि वह जमानतदारों की व्यवस्था करने में सक्षम नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गरीबी किसी व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार को प्रभावित नहीं कर सकती।
जस्टिस अनूप कुमार ढांड ने यह टिप्पणी करते हुए एक आरोपी के लिए लगाई गई दो जमानतदार प्रस्तुत करने की शर्त को निरस्त कर दिया और उसे बढ़े हुए निजी मुचलके पर रिहा करने का निर्देश दिया।
मामला घर में घुसपैठ के एक आरोपी से जुड़ा था, जिसे ट्रायल कोर्ट ने निजी मुचलके और दो जमानतदारों की शर्त पर जमानत दी थी। हालांकि आरोपी के लिए कोई भी व्यक्ति जमानतदार बनने को तैयार नहीं हुआ। इसके कारण जमानत मिलने के बावजूद वह जेल से बाहर नहीं आ सका।
इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट में आवेदन दायर कर जमानत की शर्तों में संशोधन की मांग की।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि अदालतें जमानत देते समय उचित शर्तें लगा सकती हैं लेकिन यदि कोई आरोपी उन शर्तों का पालन करने में असमर्थ है तो ऐसी शर्तें जमानत देने के मूल उद्देश्य को ही विफल कर सकती हैं। यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन भी हो सकती है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा,
"गरीबी और आर्थिक अक्षमता किसी ऐसे व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में बाधा नहीं बन सकती, जिसे जमानत दी जा चुकी है। अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और स्वतंत्रता की गारंटी देता है।"
हाईकोर्ट ने आगे कहा,
"किसी आरोपी को केवल इस आधार पर अनिश्चितकाल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता कि वह अपनी रिहाई के लिए जमानतदारों की व्यवस्था नहीं कर पा रहा है। ऐसी शर्त उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।"
इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने दो जमानतदार प्रस्तुत करने की शर्त को समाप्त किया और आरोपी को बढ़े हुए निजी मुचलके पर रिहा करने का आदेश दिया।
यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहां आर्थिक रूप से कमजोर आरोपी जमानत मिलने के बावजूद केवल जमानतदार न जुटा पाने के कारण लंबे समय तक जेल में रहने को मजबूर हो जाते हैं।