यदि यौन शोषण का इरादा होता तो माता-पिता को क्यों बुलाता”: आसाराम की राजस्थान हाइकोर्ट में दलील
कथित दुष्कर्म मामले में स्वयंभू धर्मगुरु आसाराम की ओर से राजस्थान हाइकोर्ट में विस्तृत दलीलें पेश की गईं।
जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की खंडपीठ के समक्ष बचाव पक्ष ने अभियोजन की कहानी को असंभाव्य, साक्ष्यहीन और गढ़ी हुई साजिश करार दिया।
आसाराम की ओर से एडवोकेट ने तर्क दिया कि अभियोजन का घटनाक्रम सामान्य मानवीय व्यवहार की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
उन्होंने कहा कि यदि किसी का उद्देश्य यौन शोषण होता तो वह कथित पीड़िता के माता-पिता को साथ आने के लिए क्यों कहता।
बचाव पक्ष ने सवाल उठाया,
“अगर इरादा गलत होता तो क्या मैं लड़की के साथ उसके माता-पिता को बुलाता?”
इस पर पीठ ने प्रतिप्रश्न किया,
“क्या माता-पिता सचेत नहीं हो जाते यदि लड़की को अकेले बुलाया जाता?”
बचाव पक्ष ने कहा कि बच्चों ने सार्वजनिक रूप से हरिद्वार में आसाराम से मुलाकात की थी और कथित पीड़िता ने भी अपने बयान में कहा कि बच्चों को निजी रूप से मिलने के लिए नहीं कहा गया।
हालांकि अदालत ने पूछा कि क्या दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत दर्ज बयान में निजी मुलाकात का उल्लेख है और क्या बचाव पक्ष यह कह रहा है कि वहां अलग कहानी थी।
वकील ने बताया कि कथित पीड़िता ने 2012 की घटना का उल्लेख करते हुए निजी रूप से बुलाने और अनुचित स्पर्श का आरोप लगाया है। हालांकि, उन्होंने कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि संबंधित अवधि में आसाराम का शिकायतकर्ता या उसके माता-पिता से कोई प्रत्यक्ष संपर्क था।
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि जिन दो कथित मध्यस्थों का अभियोजन ने उल्लेख किया, वे बरी हो चुके हैं और ट्रायल कोर्ट ने भी संचार के कोई ठोस साक्ष्य नहीं पाए।
ऐसे में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120बी और 370 के तहत साजिश का आरोप पूरी तरह से टूट जाता है।
अदालत को बताया गया कि शिकायतकर्ता का परिवार स्वयं छिंदवाड़ा से शाहजहांपुर, फिर दिल्ली और बाद में जोधपुर गया।
बचाव पक्ष ने प्रश्न किया,
“यदि उन्हें खुद नहीं पता था कि आसाराम कहां हैं तो पूर्व नियोजित साजिश कैसे हो सकती है?”
बचाव पक्ष ने माता-पिता के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने अपनी बेटी को प्रेतबाधित मानकर आध्यात्मिक सहायता के लिए संपर्क किया। उनका कहना था कि इस पृष्ठभूमि को ट्रायल कोर्ट ने पर्याप्त महत्व नहीं दिया।
घटना की समयरेखा और कथित पीड़िता के आचरण पर भी सवाल उठाए गए।
बचाव पक्ष के अनुसार, यदि घटना डेढ़ घंटे तक चली, तो उसी रात चुप्पी साधे रहना और कई दिनों बाद खुलासा करना स्वाभाविक व्यवहार नहीं है।
चिकित्सकीय और वैज्ञानिक साक्ष्यों पर भी गंभीर आपत्ति जताई गई।
बचाव पक्ष ने कहा कि न कोई चोट के निशान मिले, न प्रवेश के संकेत, न वीर्य, न उंगलियों के निशान और न ही डीएनए साक्ष्य।
घटनास्थल पर लॉ साइंस लैब की जांच भी नहीं कराई गई। इसे संदिग्ध और त्रुटिपूर्ण जांच बताया गया।
यह भी कहा गया कि वीडियो बयान और धारा 161 के तहत दर्ज बयान में महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं। कुछ आरोप प्रारंभिक शिकायत में नहीं थे, जो बाद में जोड़े गए जिससे अतिशयोक्ति का संकेत मिलता है।
बचाव पक्ष ने एक वैकल्पिक कारण भी सुझाया। उनके अनुसार कथित पीड़िता एक अनुशासित आध्यात्मिक विद्यालय की छात्रा थी और संभव है कि आश्रम भेजे जाने का विरोध या व्यक्तिगत कारणों से उसने झूठा आरोप लगाया हो।
जांच की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए। दिल्ली में शून्य प्राथमिकी दर्ज करने और औपचारिक FIR से पहले कथित घटनास्थल पर पुलिस की डायरी प्रविष्टियों का उल्लेख किया गया।
बचाव पक्ष का कहना था कि आरोपपत्र में उल्लिखित साजिश की समयावधि और घटनाक्रम में भी असंगतियां हैं।
बचाव पक्ष ने कहा कि अभियोजन के दस्तावेज स्वयं यह दर्शाते हैं कि हरिद्वार स्थित विद्यालय की यात्रा का कोई ठोस प्रमाण नहीं है।
वकील ने तर्क दिया,
“यदि यात्रा हुई होती तो टिकट या उपस्थित लोगों के रिकॉर्ड से आसानी से साबित किया जा सकता था।"
अंत में बचाव पक्ष ने कहा कि वैज्ञानिक साक्ष्य का अभाव संचार कड़ियों की कमी, विरोधाभासी बयान और असंगत आचरण यह दर्शाते हैं कि पूरा मामला गढ़ा हुआ है और आसाराम को झूठा फंसाया गया।
सुनवाई के बाद राजस्थान हाइकोर्ट ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए स्थगित किया।