पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि अन्य आपराधिक मामलों का लंबित होना महत्वपूर्ण बात तो है, लेकिन यह पैरोल देने से इनकार करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। कोर्ट ने NDPS Act के तहत दस साल की सजा काट रहे एक दोषी को आठ सप्ताह की पैरोल दी।

कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को यह डर है कि दोषी भाग सकता है या फिर से नशीले पदार्थों की तस्करी में शामिल हो सकता है, लेकिन इस डर के समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं है। इसलिए यह 'पंजाब गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टेम्परेरी रिलीज) एक्ट, 1962' की धारा 6(2) की शर्तों को पूरा नहीं करता है।

जस्टिस सुमीत गोयल ने श्री मुक्तसर साहिब के जिला मजिस्ट्रेट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें पैरोल की अर्जी खारिज कर दी गई थी।

उन्होंने कहा:

"याचिकाकर्ता अन्य FIR मामलों में भी शामिल है। अस्थायी रिहाई (पैरोल) की अर्जी पर विचार करते समय ऐसे पुराने मामलों को ध्यान में रखना बेशक जरूरी है, लेकिन केवल किसी अन्य आपराधिक मामले में शामिल होने भर से ही पैरोल देने से इनकार करने का पर्याप्त आधार नहीं बन जाता।"

कोर्ट ने आगे कहा,

"इस मामले में पैरोल न देने का मुख्य कारण अधिकारियों का यह डर है कि याचिकाकर्ता अस्थायी रिहाई के दौरान भाग सकता है या फिर से नशीले पदार्थों की तस्करी में शामिल हो सकता है। हालांकि, इस डर को जताने के अलावा, रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस सबूत या सामग्री पेश नहीं की गई, जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता की अस्थायी रिहाई से राज्य की सुरक्षा को खतरा हो सकता है या सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ सकती है।"

दिसंबर 2025 में याचिकाकर्ता को NDPS Act की धारा 22 के तहत दोषी ठहराया गया और उसे दस साल की कठोर कैद और 1 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। जनवरी 2026 में हाईकोर्ट ने उसकी अपील स्वीकार की थी। वह तीन साल से अधिक समय तक जेल में रह चुका है।

उसने अपने परिवार की देखभाल करने और अपने घर की मरम्मत कराने के लिए पहली बार पैरोल की अर्जी दी थी, और ग्राम पंचायत ने भी इसके लिए अपनी सहमति (नो-ऑब्जेक्शन) दी थी। 28 अगस्त 2026 को जिला मजिस्ट्रेट ने उसकी अर्जी खारिज की थी।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि अस्वीकृति का आदेश मनमाना था, इसमें बिना किसी स्पष्ट कारण के देरी की गई। साथ ही यह पूरी तरह से पुलिस अधीक्षक (SP) की रिपोर्ट पर आधारित है, जबकि जिला मजिस्ट्रेट (DM) ने खुद इस मामले की जांच करके कोई संतुष्टि नहीं जताई।

राज्य ने इस याचिका का विरोध किया। उनका तर्क था कि याचिकाकर्ता एक आदतन अपराधी है, जिसमें "ऐसे अपराधों को दोहराने की प्रवृत्ति" है। अगर उसे रिहा किया जाता है तो वह फिर से नशीले पदार्थों की बिक्री शुरू कर सकता है या फरार हो सकता है।

अदालत ने माना कि 1962 के अधिनियम की धारा 6(2) के तहत रिहाई पर रोक तभी लागू होती है जब राज्य सरकार या उसका अधिकृत अधिकारी इस बात से संतुष्ट हो कि रिहाई से राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) को खतरा हो सकता है।

अदालत ने कहा कि आपराधिक इतिहास मायने रखता है, लेकिन:

"...किसी आरोपी का अन्य आपराधिक मामलों में शामिल होना अपने आप में पैरोल देने से इनकार करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। अधिनियम की धारा 6(2) के तहत कानूनी आवश्यकता यह है कि कोई ठोस आधार होना चाहिए, जिससे यह संतुष्टि मिल सके कि कैदी की रिहाई से राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा हो सकता है।"

अदालत ने आगे कहा,

"केवल एक आशंका, जिसके समर्थन में कोई ठोस सबूत या विशेष परिस्थिति न हो जो वास्तव में ऐसे खतरे की संभावना को दर्शाती हो, उसे कानून द्वारा अपेक्षित 'संतुष्टि' नहीं माना जा सकता।"

अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि प्रतिवादियों ने ऐसा कोई दावा नहीं किया कि याचिकाकर्ता को पहले कभी पैरोल पर छोड़ा गया हो और उसने उसका दुरुपयोग किया हो।

यह पैरोल के लिए उसकी पहली याचिका थी। उनके वकील के अनुसार, जेल में उनका आचरण संतोषजनक रहा है और उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी (Adverse Entry) नहीं है। उनकी इस मांग का ग्राम पंचायत ने भी समर्थन किया।

अदालत ने कहा कि वह "याचिकाकर्ता के आपराधिक इतिहास और आरोपों की प्रकृति से अवगत है", लेकिन साथ ही यह भी माना कि "पैरोल देते समय कड़ी शर्तें लगाकर इन चिंताओं को दूर किया जा सकता है।"

अदालत ने वह आदेश रद्द किया और निर्देश दिया कि उसे रिहाई की तारीख से आठ सप्ताह के लिए पैरोल पर छोड़ा जाए। इसके लिए उसे संबंधित अदालत या ड्यूटी मजिस्ट्रेट की संतुष्टि के अनुसार बॉन्ड और जमानत (Surety) देनी होगी।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी शर्त का उल्लंघन होता है तो सक्षम अधिकारी कानून के अनुसार उसके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र हैं।

Case Title : Jagjeet Singh alias Kali v. State of Punjab and others

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