पुलिस थानों में CCTV निगरानी पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट सख्त, कहा- केवल कागजी रिपोर्ट से नहीं चलेगा काम
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने पुलिस थानों में CCTV कैमरों की निगरानी और उनके कामकाज को लेकर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि निगरानी समितियां यांत्रिक तरीके से काम कर रही हैं जिससे पूरी व्यवस्था का उद्देश्य ही विफल हो रहा है।
जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज ने पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ प्रशासन से विस्तृत जवाब मांगा। अदालत ने पूछा कि पिछले पांच वर्षों में जिला स्तरीय निगरानी समितियों से मिली रिपोर्टों की वास्तव में कितनी जांच हुई और उनमें कौन-कौन सी कमियां पाई गईं।
अदालत ने कहा कि केवल बड़े पैमाने पर रिपोर्टें जमा कर लेना पर्याप्त नहीं है। यह देखना जरूरी है कि क्या वास्तव में पुलिस थानों में CCTV कैमरे काम कर रहे हैं फुटेज सुरक्षित रखी जा रही है और निगरानी समितियां मौके पर जाकर सत्यापन भी कर रही हैं या नहीं।
सुनवाई के दौरान पटियाला के उपायुक्त ने अदालत को बताया कि पुलिस थानों से हर महीने रिपोर्ट आती हैं और उन्हें आगे भेज दिया जाता है। हालांकि वह यह स्पष्ट नहीं कर सके कि बाद में कोई औचक निरीक्षण या वास्तविक जांच की जाती है या नहीं।
इस पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि अदालतों में अक्सर यह कहा जाता है कि CCTV फुटेज उपलब्ध नहीं है या कैमरे खराब थे। ऐसे में निगरानी व्यवस्था की जवाबदेही बेहद जरूरी हो जाती है।
मामले में एमिक्स क्यूरी सीनियर एडवोकेट क्षितिज शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के शफी मोहम्मद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह मामलों का हवाला देते हुए कहा कि अदालतों के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद निगरानी व्यवस्था प्रभावी तरीके से लागू नहीं हो रही है।
उन्होंने यह भी बताया कि पिछले कई वर्षों में केंद्रीय निगरानी निकाय द्वारा जारी निर्देश सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं और मानवाधिकार उल्लंघनों की पहचान के लिए CCTV फुटेज की सक्रिय निगरानी का भी कोई ठोस प्रमाण नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा,
“यह मुद्दा अत्यंत महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल CCTV कैमरे लगाना ही नहीं, बल्कि उनकी फुटेज कम से कम छह महीने तक सुरक्षित रखना भी अनिवार्य है।”
अदालत ने पंजाब, हरियाणा और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ की राज्य स्तरीय निगरानी समितियों से विस्तृत जवाब तलब किया।