पालतू कुत्ते को श्रीकृष्ण का गेटअप देना अपराध नहीं, भक्ति की अभिव्यक्ति: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

Update: 2026-07-03 09:51 GMT

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महिला के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करते हुए कहा कि जन्माष्टमी के अवसर पर अपने पालतू कुत्ते को भगवान श्रीकृष्ण की वेशभूषा पहनाकर उसकी तस्वीर व्हाट्सऐप पर साझा करना भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 298 के तहत अपराध नहीं है।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में धार्मिक भावनाएं आहत करने की मंशा साबित नहीं होती और कानून के तहत अपराध के आवश्यक तत्व भी मौजूद नहीं हैं।

जस्टिस सुभाष मेहला की एकलपीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति की निजी आस्था और अनुभवों से प्रेरित अभिव्यक्ति को केवल इसलिए अपराध नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह कुछ लोगों की भावनाओं से मेल नहीं खाती।

अदालत ने कहा,

"आपराधिक मंशा के अभाव में केवल किसी की व्यक्तिपरक भावना के आहत होने के आधार पर आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती। संवैधानिक सहिष्णुता को अतिसंवेदनशीलता पर वरीयता दी जानी चाहिए।"

मामला उस FIR से जुड़ा था जिसमें आरोप लगाया गया कि महिला ने जन्माष्टमी पर अपने पालतू कुत्ते को भगवान श्रीकृष्ण की वेशभूषा पहनाकर उसकी तस्वीर व्हाट्सऐप स्टेटस पर लगाई, जिससे हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।

जांच के दौरान महिला ने बताया कि उसकी कोई संतान नहीं है और वह अपने पालतू कुत्ते को बच्चे की तरह मानती है। उसने त्योहार के अवसर पर स्नेह और श्रद्धा के भाव से उसे श्रीकृष्ण का स्वरूप पहनाया था किसी की धार्मिक भावनाएं आहत करने का उसका कोई इरादा नहीं था।

हाईकोर्ट ने कहा कि BNS की धारा 298 लागू होने के लिए यह आवश्यक है कि किसी पूजा स्थल या पूजा से जुड़े पवित्र वस्तु को नुकसान पहुंचाने, अपवित्र करने या उसका अपमान करने का कृत्य और धर्म का अपमान करने की मंशा दोनों मौजूद हों।

अदालत ने माना कि इस मामले में पालतू कुत्ते को पहनाए गए वस्त्र को धारा 298 के तहत आने वाली 'पूजनीय वस्तु' नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि महिला का यह कृत्य सद्भावना, प्रेम और भक्ति की भावना से प्रेरित था। व्हाट्सऐप पर तस्वीर साझा करने का उद्देश्य भी अपने स्नेह का प्रदर्शन करना था, न कि किसी धर्म या आस्था का अपमान करना।

अपने फैसले में जस्टिस सुभाष मेहला ने श्रीमद्भगवद्गीता, महाभारत और रामचरितमानस का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा सभी जीवों में ईश्वर का वास मानती है।

अदालत ने कहा कि यदि श्रीकृष्ण स्वयं गीता में समभाव का संदेश देते हैं तो कुत्ते में भी ईश्वर का स्वरूप देखना ईशनिंदा नहीं बल्कि दिव्य सत्य की अनुभूति है।

फैसले में महाभारत के उस प्रसंग का भी उल्लेख किया गया, जिसमें युधिष्ठिर स्वर्ग जाते समय अपने साथ चल रहे कुत्ते को छोड़ने से इनकार कर देते हैं और बाद में वही कुत्ता धर्मराज के रूप में प्रकट होता है।

अदालत ने कहा कि हिंदू परंपरा में कुत्ते का संबंध भगवान कालभैरव और भगवान दत्तात्रेय से भी जोड़ा गया तथा उसे निष्ठा, करुणा और संरक्षण का प्रतीक माना गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि जन्माष्टमी पर बच्चों को बालकृष्ण के रूप में सजाने की परंपरा भी भक्ति का ही एक स्वरूप है। यदि महिला अपने पालतू कुत्ते को अपने बच्चे की तरह मानती है और उसे उसी भाव से श्रीकृष्ण का स्वरूप पहनाती है, तो यह उसकी भक्ति की अभिव्यक्ति है।

अदालत ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 25 के तहत धर्म एवं आस्था की स्वतंत्रता इस तरह की सद्भावनापूर्ण धार्मिक अभिव्यक्ति की भी रक्षा करते हैं।

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने महिला के खिलाफ दर्ज FIR रद्द की।

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