पूर्णकालिक दायित्व निभाने वाले विधि अधिकारियों को केवल संविदा नहीं कहा जा सकता, वे मेडिकल लाभ व अर्जित अवकाश के हकदार: पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि हरियाणा सरकार द्वारा नियुक्त सहायक एडवोकेट जनरल (AAG) और डिप्टी एडवोकेट जनरल (DAG) को केवल संविदा नियुक्ति का नाम देकर मूल सेवा लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे अधिकारियों को अवकाश यात्रा रियायत, मेडिकल प्रतिपूर्ति और अर्जित अवकाश सहित अन्य लाभ दिए जाने चाहिए।
जस्टिस संदीप मौदगिल ने कहा,
“याचिकाकर्ता AAG/DAG के रूप में राज्य सरकार के अन्य विधि अधिकारियों की तुलना में अधिक दायित्व और कार्यभार निभा रहे हैं। वे न केवल अदालतों में राज्य का पक्ष रखते हैं बल्कि विभागों को विधिक राय देना लिखित उत्तरों का परीक्षण करना और अन्य प्रशासनिक कार्य भी करते हैं।”
अदालत ने कहा कि जब इन अधिकारियों को निजी वकालत करने से रोका गया और वे पूर्णकालिक रूप से राज्य की सेवा में लगे हैं तब उन्हें अवकाश यात्रा रियायत मेडिकल प्रतिपूर्ति और अन्य भत्तों से वंचित करना भेदभावपूर्ण होगा। यह उन्हें अन्य विभागों में कार्यरत विधि अधिकारियों के मुकाबले कमतर स्थिति में रखने जैसा है।
मामले में याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति 29 दिसंबर, 2017 के सार्वजनिक विज्ञापन के आधार पर हुई। उन्हें 30 जून, 2018 के नियुक्ति पत्र के तहत संशोधित वेतनमान दिया गया, जो बाद में सातवें वेतन आयोग के अनुरूप संशोधित हुआ।
बाद में लेखा आपत्तियों के आधार पर राज्य ने वेतन पुनर्निर्धारण और कथित अधिक भुगतान की वसूली की कार्रवाई शुरू की, जिसे हाइकोर्ट में चुनौती दी गई।
कार्यवाही के दौरान राज्य सरकार ने अधिकांश मांगों को स्वीकार कर लिया, जिसमें उच्च वेतनमान की बहाली और वार्षिक वेतनवृद्धि की तिथि में संशोधन शामिल था। विवाद अंततः मेडिकल प्रतिपूर्ति, अवकाश यात्रा रियायत और अर्जित अवकाश तक सीमित रह गया।
राज्य का तर्क था कि याचिकाकर्ता हरियाणा विधि अधिकारी (नियोजन) अधिनियम, 2016 के तहत संविदा आधार पर नियुक्त हैं और उन्हें सरकारी कर्मचारी का दर्जा प्राप्त नहीं है। इसलिए वे उक्त लाभों के पात्र नहीं हैं।
अदालत ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए कहा कि राज्य के विधि अधिकारियों की भूमिका केवल औपचारिक या अस्थायी नहीं है बल्कि संवैधानिक ढांचे का अभिन्न हिस्सा है।
जस्टिस मौदगिल ने कहा कि जब सरकार किसी वकील को निजी प्रैक्टिस से रोककर पूर्णकालिक जिम्मेदारी देती है तब उसकी सेवा शर्तों में गरिमा और निष्पक्षता परिलक्षित होनी चाहिए।
अदालत ने कहा कि केवल नामकरण के आधार पर सेवा लाभ सीमित करना मनमाना होगा और समानता के सिद्धांत के विपरीत होगा।
अदालत ने टिप्पणी की,
“यदि राज्य वेतन और वेतनवृद्धि में समानता देता है तो वह बिना ठोस आधार के आवश्यक लाभों से वंचित नहीं कर सकता।"
निर्णय में यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति सार्वजनिक विज्ञापन के आधार पर स्वीकृत पदों पर हुई, उनका वेतन राज्य की समेकित निधि से वेतन मद में दिया जाता है। उन पर आयकर उसी प्रकार काटा जाता है जैसे नियमित कर्मचारियों पर और उन्हें निजी प्रैक्टिस की अनुमति नहीं है। ऐसे में उनके कार्य को केवल संविदात्मक कहकर लाभों से वंचित करना उचित नहीं है।
अदालत ने वैध अपेक्षा के सिद्धांत का भी उल्लेख करते हुए कहा कि जब राज्य लगातार वेतनमान और भत्तों में संशोधन करता रहा है तो यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि मूल सेवा लाभों से वंचित नहीं किया जाएगा।
हाइकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि AAG और DAG सहित संबंधित विधि अधिकारियों को अवकाश यात्रा रियायत, मेडिकल प्रतिपूर्ति और अन्य देय लाभ चार सप्ताह के भीतर जारी किए जाएं।