जितना गंभीर अपराध, उतने मजबूत सबूत जरूरी: दुष्कर्म साजिश मामले में महिला को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने किया बरी
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने वर्ष 2002 के दुष्कर्म मामले में आपराधिक साजिश के आरोप में दोषी ठहराई गई महिला को बरी करते हुए कहा कि केवल शक या सीमित भूमिका के आधार पर किसी व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120-बी के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस रूपिंदरजीत चहल ने कहा,
“अपराध कितना भी गंभीर या विचलित करने वाला क्यों न हो, केवल संदेह कानूनी सबूत का स्थान नहीं ले सकता। आपराधिक न्याय व्यवस्था का स्थापित सिद्धांत है 'जितना गंभीर अपराध, उतने मजबूत सबूत।' इसलिए कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि दोष सिद्ध करने के लिए अभियोजन को आरोप संदेह से परे साबित करने होंगे।”
मामले में ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2004 में महिला को दोषी ठहराया था। हालांकि हाइकोर्ट ने उसकी अपील स्वीकार करते हुए सजा और दोषसिद्धि दोनों को रद्द किया।
अभियोजन के अनुसार महिला पीड़िता को अपने साथ लेकर गई और उससे कहा कि वह कमरे में जाकर देखे कि सह-आरोपी सुधीर कुमार मौजूद है या नहीं। जैसे ही पीड़िता कमरे में गई, सह-आरोपी ने कथित रूप से चाकू दिखाकर उसे बिस्तर पर लेटने के लिए मजबूर किया और दुष्कर्म किया।
मुख्य आरोपी सुधीर कुमार के खिलाफ दुष्कर्म का आरोप था, जबकि महिला पर आरोप लगाया गया कि उसने घटना को संभव बनाने में मदद की और साजिश का हिस्सा थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि महिला की कथित भूमिका “बेहद सीमित” थी और इससे यह साबित नहीं होता कि उसे किसी आपराधिक योजना की जानकारी थी।
अदालत ने यह भी नोट किया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे साबित हो कि महिला घटना के समय कमरे के बाहर मौजूद थी या उसने अपराध में सक्रिय सहायता की।
हाईकोर्ट ने पीड़िता के जिरह के दौरान दिए बयान का भी उल्लेख किया, जिसमें उसने कहा कि उसे यह निश्चित रूप से नहीं पता कि महिला कमरे के बाहर थी या वहां से जा चुकी थी।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि आरोपियों के बीच पहले से कोई योजना, बातचीत या आपसी सहमति थी।
हाईकोर्ट ने दोहराया,
“चाहे संदेह कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह सबूत का विकल्प नहीं बन सकता।”
अदालत ने कहा कि जब तक किसी अवैध कार्य के लिए आपसी सहमति और साजिश को ठोस तथा विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित न किया जाए, तब तक धारा 120-बी के तहत दोषसिद्धि कायम नहीं रह सकती।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन आरोपों की पूरी श्रृंखला साबित करने में विफल रहा है। इसलिए महिला को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी किया जाता है।