कार्यस्थल विवाद में गाली देना यौन उत्पीड़न नहीं: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने रद्द की FIR
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि कार्यस्थल पर विवाद के दौरान “फ*** ऑफ” जैसे अपशब्द का प्रयोग, भले ही अनुचित हो, लेकिन यदि उसमें यौन आशय या संकेत न हो तो इसे यौन उत्पीड़न नहीं माना जा सकता।
जस्टिस कीर्ति सिंह ने कहा कि किसी एक बार की अभद्र टिप्पणी, जिसमें यौन तत्व या लगातार ऐसा व्यवहार न हो उसे दंडनीय यौन उत्पीड़न की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
अदालत ने कहा,
“सिर्फ एक अपमानजनक टिप्पणी, जिसमें यौन आशय न हो, कानून के उस स्तर को पूरा नहीं करती जो लैंगिक उत्पीड़न के लिए आवश्यक है।”
मामला निजी कंपनी के निदेशक के खिलाफ दर्ज FIR से जुड़ा है, जिसमें उन पर कार्यस्थल पर महिला कर्मचारी से अभद्र भाषा इस्तेमाल करने का आरोप है। यह घटना ईमेल के माध्यम से हुई बातचीत के दौरान सामने आई, जब कर्मचारी ने अवकाश लिया था और उसी को लेकर विवाद हुआ।
अदालत ने पाया कि कथित टिप्पणी पेशेवर विवाद के दौरान की गई और उसमें किसी प्रकार का यौन संकेत, शारीरिक संपर्क, यौन प्रस्ताव या अश्लील सामग्री का कोई तत्व नहीं है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354-ए के तहत यौन उत्पीड़न के लिए आवश्यक तत्व जैसे अवांछित शारीरिक संपर्क, यौन संबंध की मांग या अश्लील टिप्पणी इस मामले में मौजूद नहीं हैं।
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि शिकायत घटना के चार महीने बाद दर्ज कराई गई और इससे पहले दोनों पक्षों के बीच वेतन, नोटिस अवधि और अनुबंध को लेकर विवाद चल रहा है।
फैसले में कहा गया कि यदि आरोपों में अपराध के मूल तत्व ही नहीं बनते तो ऐसी आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने FIR और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को रद्द किया। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को एक माह के भीतर 20 हजार रुपये एक जनकल्याण कोष में जमा करने का निर्देश भी दिया।