व्यक्तिगत स्वतंत्रता दिखावे की चीज नहीं, वास्तविक अधिकार है: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने आरोपी को दी जमानत
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एक ऐसे आरोपी को जमानत दी, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा उसकी सजा रद्द किए जाने के बावजूद 15 वर्षों से अधिक समय तक जेल में बंद रहा।
जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व पर जोर देते हुए कहा,
“स्वतंत्रता कोई दिखावटी चीज नहीं है, यह वास्तविक अधिकार है।”
अदालत ने कहा कि जब किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रभावी सजा मौजूद नहीं है, तब उसे लगातार जेल में रखना उचित नहीं ठहराया जा सकता।
मामला वर्ष 2006 में दर्ज एक हत्या के मुकदमे से जुड़ा है, जिसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302, 387 और 120-बी समेत कई गंभीर आरोप लगाए गए।
ट्रायल कोर्ट ने 2009 में 33 आरोपियों में से 32 को बरी कर दिया और केवल एक आरोपी को दोषी ठहराया। बाद में राज्य सरकार की अपील पर हाइकोर्ट ने कुछ आरोपियों की बरी किए जाने का फैसला पलटते हुए उन्हें दोषी ठहराया, जिनमें वर्तमान आवेदक बलजीत सिंह भी शामिल था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में यह कहते हुए हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया कि आरोपियों को पर्याप्त सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था। इसके बाद मामला दोबारा विचार के लिए हाईकोर्ट भेज दिया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बलजीत सिंह की स्थिति फिर से एक बरी व्यक्ति जैसी हो गई, क्योंकि उसकी सजा समाप्त हो चुकी थी।
अदालत ने कहा,
“जब किसी आरोपी को सजा ही नहीं है, तब सजा निलंबन की अर्जी स्वीकार नहीं की जा सकती।”
हालांकि, अदालत ने इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि बरी स्थिति बहाल होने के बावजूद आरोपी 12 वर्षों से अधिक समय तक जेल में बंद रहा, जबकि रियायत अवधि जोड़ने पर यह अवधि 15 साल से ज्यादा हो जाती है।
इसके बाद अदालत ने न्यायहित और प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए जमानत पर विचार किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि बरी किए गए व्यक्ति के पक्ष में निर्दोषता की धारणा और मजबूत हो जाती है, इसलिए ऐसे मामलों में सामान्य नियम जमानत होना चाहिए, जेल नहीं।
अदालत ने कहा,
“जमानत नियम है और जेल अपवाद।”
इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने बलजीत सिंह को संबंधित मुकदमे में जमानत दी। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि वह अन्य मामलों में, जिनमें एक हत्या का मामला भी शामिल है, जिसमें उसे आजीवन कारावास की सजा मिली हुई, जेल में बना रहेगा।
हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि इस मामले में बिताई गई हिरासत अवधि को नहीं गिना जाएगा, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामला वापस भेजे जाने के बाद उसकी बरी स्थिति बहाल हो चुकी है।
मुख्य अपील पर अंतिम सुनवाई अभी लंबित है।