पति का यात्रा का खर्च उठाने का प्रस्ताव पत्नी की केस ट्रांसफर की अर्ज़ी अपने-आप खारिज नहीं कर सकता: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने पत्नी की अर्ज़ी पर हिसार की फैमिली कोर्ट से सोनीपत की फैमिली कोर्ट में पति द्वारा दायर तलाक की अर्ज़ी ट्रांसफर की। कोर्ट ने कहा कि सुनवाई के लिए यात्रा का खर्च उठाने का पति का प्रस्ताव कोई ऐसा सख्त नियम नहीं है, जिससे पत्नी की ट्रांसफर की मांग खारिज हो जाए और वैवाहिक मामलों में केस ट्रांसफर करते समय महिला पक्षकार की सुविधा को उचित महत्व दिया जाना चाहिए। [2026 LiveLaw (PH) 322]
जस्टिस हरकेश मनुजा ने कहा,
"प्रतिवादी के वकील ने जिन फैसलों का हवाला दिया, उनसे उनके मामले को कोई मदद नहीं मिलती। प्रीति शर्मा (ऊपर उल्लिखित) मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले के तथ्यों के आधार पर पाया कि ट्रांसफर का कोई ठोस आधार नहीं था। इसलिए कोर्ट ने पति को निर्देश दिया कि वह पत्नी और उसके साथ आने वाले व्यक्ति के यात्रा और ठहरने का खर्च उठाए, जब भी सुनवाई के लिए उसकी मौजूदगी ज़रूरी हो। इसलिए उस फैसले को ऐसा सख्त नियम नहीं माना जा सकता कि यात्रा का खर्च उठाने का पति का प्रस्ताव हर मामले में पत्नी की ट्रांसफर की मांग खारिज कर देगा। ट्रांसफर के सवाल पर हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर विचार किया जाना चाहिए।"
दोनों पक्षों की शादी 2013 में हुई और उनका एक नाबालिग बेटा है, जिसका जन्म 2015 में हुआ था। वैवाहिक कलह के बीच पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत हिसार की फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्ज़ी दायर की। पत्नी, जो सोनीपत में अपनी विधवा माँ और नाबालिग बच्चे के साथ रहती है, उसने अर्ज़ी को सोनीपत की फैमिली कोर्ट में ट्रांसफर करने की मांग की।
पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि वह और उसका नाबालिग बेटा सोनीपत में अपनी विधवा माँ के साथ रहते हैं, इसलिए केस को उनके निवास के पास ट्रांसफर किया जाना चाहिए।
पति के वकील ने ट्रांसफर का विरोध करते हुए कहा कि पति उन सुनवाइयों के लिए पत्नी का यात्रा खर्च उठाने को तैयार है जिनमें उसकी मौजूदगी ज़रूरी है।
कोर्ट ने गौर किया कि पत्नी ने पहले CrPC की धारा 125 के तहत गुजारा-भत्ता (मेंटेनेंस) की अर्ज़ी दायर की। यह मामला पहले सोनीपत की फैमिली कोर्ट में था और उसका निपटारा हो चुका था, लेकिन दोनों पक्षों की अपीलें अभी भी हाईकोर्ट में लंबित थीं, जिससे पता चलता है कि मामला सोनीपत से जुड़ा है।
कोर्ट ने पत्नी की इन खास दलीलों पर भी ध्यान दिया कि उसकी आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है, वह अपनी विधवा माँ और छोटे भाई पर निर्भर है और सोनीपत में रहते हुए अपने नाबालिग बेटे की रोज़मर्रा की देखभाल की पूरी ज़िम्मेदारी उसी की है।
सुमिता सिंह बनाम कुमार संजय (2002) और रजनी किशोर परदेशी बनाम किशोर बाबूलाल परदेशी (2005) के मामलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने उस स्थापित सिद्धांत को दोहराया कि ट्रांसफर एप्लीकेशन पर फैसला करते समय कोर्ट को महिला पक्षकारों की सुविधा को ज़्यादा महत्व देना चाहिए और उन्हें अनावश्यक परेशानी से बचाने के लिए आमतौर पर ट्रांसफर की अनुमति दी जानी चाहिए।
अकविंदर कौर मामले को तथ्यों के आधार पर अलग माना गया, क्योंकि मौजूदा मामले में पत्नी की स्वतंत्र आय का न होना, विधवा माँ पर उसकी निर्भरता और नाबालिग बच्चे की ज़िम्मेदारी जैसे पहलू शामिल थे, साथ ही सोनीपत से जुड़ी CrPC की धारा 125 की कार्यवाही भी पहले से ही हाईकोर्ट में लंबित है।
कोर्ट ने अनिंदिता दास बनाम श्रीजीत दास (2006) के मामले से भी इसे अलग माना, जहां बच्चे की देखभाल के लिए दादा-दादी उपलब्ध थे और पति ने खर्च उठाने की पेशकश की थी, इसलिए ट्रांसफर से इनकार कर दिया गया; जबकि मौजूदा मामले में पत्नी खुद अपनी विधवा माँ के साथ रह रही थी और बच्चे की देखभाल की पूरी ज़िम्मेदारी उसी की थी, साथ ही उसकी कोई स्वतंत्र आय भी नहीं थी, जिससे अनिंदिता दास मामले का आधार यहाँ लागू नहीं होता था।
ट्रांसफर एप्लीकेशन को मंज़ूरी देते हुए कोर्ट ने माना कि पत्नी ने ट्रांसफर के लिए पर्याप्त आधार बताए हैं और इस स्थापित सिद्धांत को ध्यान में रखा कि वैवाहिक मामलों में पत्नी की सुविधा को उचित महत्व दिया जाना चाहिए।
याचिका हिसार की फैमिली कोर्ट से सोनीपत की फैमिली कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया। साथ ही केस का रिकॉर्ड उसी के अनुसार भेजने और दोनों पक्षों को 18.09.2026 को सोनीपत कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया गया और संबंधित मामलों को भी उसी तारीख पर सूचीबद्ध करने को कहा गया।