'उम्मीद है समझदारी से काम लिया जाएगा और मामला शांति से सुलझाया जाएगा': LADC स्कीम के खिलाफ वकीलों की हड़ताल पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की गई। इसमें आरोप लगाया गया कि 'लीगल एड डिफेंस काउंसिल' (LADC) स्कीम के खिलाफ वकीलों की हड़ताल की वजह से पंजाब में लोगों को न्याय नहीं मिल पा रहा है।
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट, बार काउंसिल के सदस्यों और सीनियर वकीलों की बात सुनने के बाद कोर्ट ने उम्मीद जताई कि यह विवाद बिना किसी कानूनी दखल के शांति से सुलझा लिया जाएगा।
एक्टिंग चीफ जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की डिवीजन बेंच ने कहा:
"हमारी गुजारिश पर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट, बार काउंसिल के कुछ सदस्य और सीनियर वकील कोर्ट के सामने पेश हुए। उनका मानना है कि ऐसे मुद्दों को बार के स्तर पर ही शांति से सुलझाया जाना चाहिए।"
बेंच ने आगे कहा:
"हमें उम्मीद और भरोसा है कि समझदारी से काम लिया जाएगा और इस मामले में उठाए गए मुद्दे को सुलझाने के लिए कोर्ट को कानूनी तौर पर दखल नहीं देना पड़ेगा।"
यह PIL हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील अरविंद सेठ ने दायर की है। उन्होंने पंजाब भर की डिस्ट्रिक्ट कोर्ट्स में अलग-अलग वकील संगठनों की हड़ताल की वजह से कामकाज में आ रही रुकावटों पर चिंता जताई।
याचिका के मुताबिक, नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) ने 'लीगल एड डिफेंस काउंसिल' (LADC) सिस्टम शुरू किया। इसका मकसद कानूनी मदद पाने के हकदार लोगों को कानूनी प्रतिनिधित्व देने के लिए एक संस्थागत सिस्टम बनाना था। इस स्कीम के आने के बाद पंजाब में कई बार एसोसिएशन ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि इससे पहले के 'पैनल काउंसिल सिस्टम' के तहत प्रैक्टिस करने वाले वकीलों को मिलने वाले मौकों पर बुरा असर पड़ा है।
याचिका में कहा गया कि स्कीम के विरोध में कई बार एसोसिएशन ने प्रस्ताव पास किए और अनिश्चितकालीन "काम बंद" हड़ताल का ऐलान किया।
इसमें यह भी कहा गया कि चल रही हड़ताल की वजह से पंजाब की डिस्ट्रिक्ट कोर्ट्स में कानूनी कार्यवाही में बार-बार देरी हो रही है, जिससे लोगों को न्याय नहीं मिल पा रहा है।
उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्ता ने साफ किया कि PIL में LADC स्कीम से जुड़े विवाद के गुण-दोष पर फैसले की मांग नहीं की गई। इसके बजाय, याचिका में कहा गया कि वकीलों की मांगों में कितना दम है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता; अदालत का कामकाज ठप नहीं होने दिया जा सकता, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत न्याय पाने का अधिकार गारंटीकृत है।
इस स्थापित कानून का हवाला देते हुए कि वकीलों को हड़ताल करने या अदालतों का बहिष्कार करने का न तो कोई कानूनी और न ही कोई मौलिक अधिकार है, याचिका में तर्क दिया गया कि अदालतों तक पहुंच 'कानून के शासन' (rule of law) का एक ज़रूरी हिस्सा है।
इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने पंजाब की सभी ज़िला अदालतों का कामकाज सुचारू रूप से चलाने और न्यायिक कार्यों में किसी भी तरह की बाधा को रोकने के लिए निर्देश देने की मांग की।
खुद पेश होते हुए सेठ ने अदालत के सामने कहा:
"महत्वपूर्ण मुद्दों को उजागर करने के लिए सही तरीकों से विरोध करना तो ठीक है, लेकिन ऐसा करते समय किसी को भी न्याय प्रशासन में दखल देने या मुक़दमेबाज़ों को न्याय पाने से रोकने की इजाज़त नहीं है।"
इस मामले की अगली सुनवाई 23 जुलाई को होगी।
Title: ARVIND SETH V/S STATE OF PUNJAB AND OTHERS