पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि केवल यह कहना कि RTI Act के तहत मांगी गई जानकारी लंबित सिविल मुकदमे में मदद करेगी, तीसरे पक्ष से जुड़ी सूचना के खुलासे के लिए जरूरी बड़े सार्वजनिक हित को साबित नहीं करता।

जस्टिस कीर्ति सिंह ने पंजाब राज्य सूचना आयोग के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें FIR से संबंधित सूचना देने से इनकार किया गया।

कोर्ट ने कहा कि किसी लंबित मामले में कोई सूचना याचिकाकर्ता के लिए उपयोगी हो सकती है लेकिन केवल इस आधार पर निजी मुकदमे की जरूरत को RTI Act के तहत बड़े सार्वजनिक हित में नहीं बदला जा सकता। RTI कानून में तीसरे पक्ष की सूचना सिर्फ इसलिए सार्वजनिक करने का प्रावधान नहीं है कि आवेदक उसे अपने किसी दूसरे मुकदमे में उपयोगी मानता है।

मामला पटियाला जिले के खेड़ी गंडियां थाने में दर्ज FIR संख्या 0093, दिनांक 22 नवंबर 2024 से जुड़ा था। यह FIR 13 नवंबर 2024 की घटना को लेकर दर्ज हुई। जसवीर राम शिकायतकर्ता थे, जबकि आरोपियों में अज्ञात व्यक्तियों का उल्लेख था। याचिकाकर्ता न तो शिकायतकर्ता था और न ही FIR में आरोपी बनाया गया।

याचिकाकर्ता ने RTI आवेदन के जरिए शिकायत और FIR दर्ज होने से लेकर सूचना दिए जाने तक पंजाब पुलिस और पंजाब सरकार की ओर से की गई पूरी कार्रवाई की प्रतियां मांगी थीं। निर्धारित अवधि में सूचना नहीं मिलने पर उसने पहले अपील और फिर पंजाब राज्य सूचना आयोग के समक्ष दूसरी अपील दाखिल की।

पुलिस अधिकारियों ने आयोग के समक्ष आपत्ति जताई कि मांगी गई सूचना तीसरे पक्ष से संबंधित है और RTI Act की धारा 8(1)(j) के तहत इसके खुलासे से छूट प्राप्त है। पुलिस ने एक पत्र और हलफनामा भी रिकॉर्ड पर रखा, जिसमें बताया गया कि संबंधित पक्षों के बीच समझौता हो चुका है और शिकायतकर्ता ने इस संबंध में हलफनामा दिया। इसके बाद आयोग ने 5 अगस्त 2026 को सूचना देने से इनकार करते हुए दूसरी अपील का निपटारा किया।

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि सूचना सार्वजनिक प्राधिकारियों द्वारा FIR के संबंध में की गई कार्रवाई से जुड़ी है, इसलिए इसे केवल इसलिए निजी सूचना नहीं माना जा सकता कि याचिकाकर्ता उस मामले का पक्षकार नहीं है। यह भी दलील दी गई कि RTI Act की धारा 6(2) के तहत आवेदक को सूचना मांगने का कारण बताने की जरूरत नहीं है। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि मांगी गई जानकारी संबंधित जमीन मालिकों से जुड़े लंबित सिविल मुकदमे में सीधे उपयोगी थी।

कोर्ट ने माना कि धारा 6(2) आवेदक को RTI आवेदन में सूचना मांगने का उद्देश्य बताने से मुक्त करती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि धारा 8 में दी गई छूट के बावजूद हर सूचना के खुलासे का असीमित अधिकार मिल जाता है। कोर्ट ने कहा कि सूचना मांगने का कारण बताने की बाध्यता न होना और मांगी गई सूचना का कानूनी रूप से सार्वजनिक किए जाने योग्य होना, दोनों अलग-अलग सवाल हैं।

पीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने केवल FIR की प्रति नहीं मांगी थी, जो एक सार्वजनिक दस्तावेज हो सकती है, बल्कि पूरी कार्रवाई से संबंधित रिकॉर्ड मांगा था। ऐसे रिकॉर्ड में शिकायतकर्ता और अन्य संबंधित व्यक्तियों से जुड़ी सामग्री शामिल हो सकती है। केवल किसी रिकॉर्ड का सार्वजनिक प्राधिकरण के पास होना यह सुनिश्चित नहीं करता कि उसकी प्रत्येक जानकारी स्वतः सार्वजनिक की जा सकती है।

याचिकाकर्ता के इस तर्क पर कि वह सूचना पाने का हकदार है, कोर्ट ने कहा कि सूचना आयोग ने केवल उसकी स्थिति या पक्षकार न होने के आधार पर आवेदन खारिज नहीं किया। आयोग ने सूचना की प्रकृति, तीसरे पक्ष की आपत्ति और उपलब्ध सामग्री पर विचार किया। याचिकाकर्ता की स्थिति भी इन परिस्थितियों में एक प्रासंगिक तथ्य थी।

हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ता के अपने RTI आवेदन और बाद की दलीलों से संकेत मिलता है कि सूचना का इस्तेमाल मीडिया या अन्य मंचों और अदालतों के समक्ष लंबित सिविल मुकदमे में किया जाना था। कोर्ट ने कहा कि यह स्थिति बड़े सार्वजनिक हित के बजाय निजी मुकदमेबाजी से जुड़े हित की ओर इशारा करती है।

कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा भी स्पष्ट की। संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत हाईकोर्ट सूचना आयोग के आदेश पर अपीलीय अदालत की तरह सुनवाई नहीं करता। हस्तक्षेप तभी किया जाता है जब आदेश में स्पष्ट कानूनी त्रुटि, विकृति, अधिकार क्षेत्र संबंधी कमी, विचार न करने की स्थिति या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हो। इस मामले में ऐसी कोई कमी नहीं मिली।

हाईकोर्ट ने कहा कि सूचना आयोग ने पुलिस की आपत्ति, याचिकाकर्ता की स्थिति, समझौते से संबंधित सामग्री और मांगी गई सूचना की प्रकृति पर विचार किया। इसलिए आयोग के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। कोर्ट ने याचिका खारिज की।

पीठ ने स्पष्ट किया कि उसने जमीन विवाद, लंबित सिविल मुकदमे, FIR में लगाए गए आरोपों या पक्षकारों के बीच हुए समझौते के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी। कोर्ट का विचार केवल RTI Act के तहत सूचना देने से संबंधित आयोग के फैसले की वैधानिकता तक सीमित रहा।

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