पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी महिला पर आरोप है कि वह खुद देह व्यापार में शामिल होकर उससे होने वाली कमाई से अपना जीवनयापन कर रही थी, तो केवल इस आधार पर उसके खिलाफ अनैतिक देह व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 की धारा 4 और 5 के तहत आरोप तय नहीं किए जा सकते। कोर्ट ने महिला के खिलाफ इन दोनों धाराओं में तय आरोपों को रद्द किया।

यह मामला एक ऐसी महिला से जुड़ा था, जिसने शुरुआत में सामूहिक दुष्कर्म की FIR दर्ज कराई, लेकिन जांच के दौरान पुलिस ने उसे ही आरोपी बना दिया।

जस्टिस मनीषा बत्रा ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि धारा 4 का संबंध किसी अन्य महिला या लड़की के देह व्यापार से होने वाली कमाई पर जीवनयापन करने से है। यदि आरोप यह है कि महिला खुद देह व्यापार में शामिल थी, तो इस धारा के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते।

कोर्ट ने कहा कि महिला पर यह आरोप नहीं है कि वह किसी दूसरी महिला या लड़की की देह व्यापार से होने वाली कमाई पर निर्भर है। इसके विपरीत, अभियोजन का मामला यह था कि वह खुद कथित रूप से देह व्यापार में शामिल थी। उसके द्वारा किसी अन्य महिला की कमाई हासिल करने या अपने कब्जे में लेने अथवा किसी अन्य महिला के लिए दलाल के रूप में काम करने का भी आरोप नहीं था। इसलिए धारा 4 के तहत आरोप टिक नहीं सकता।

धारा 5 के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान किसी महिला या लड़की को देह व्यापार के लिए हासिल करने, बहकाने या एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने अथवा उसे देह व्यापार के लिए प्रेरित करने जैसे कृत्यों से संबंधित है। इस मामले में महिला पर इनमें से कोई भूमिका निभाने का आरोप नहीं लगाया गया।

अदालत ने कहा कि अभियोजन का आरोप केवल इतना था कि महिला अन्य आरोपियों के साथ गई और कथित रूप से पैसे के बदले यौन संबंध बनाए। उस पर किसी दूसरी महिला या लड़की को देह व्यापार के लिए हासिल करने, बहकाने या कहीं ले जाने का आरोप नहीं था। ऐसे में धारा 5 के मूल तत्व भी उसके खिलाफ आकर्षित नहीं होते।

मामले की शुरुआत 19 सितंबर 2015 की घटना के संबंध में महिला के बयान से हुई। उसने आरोप लगाया कि दो लोग उसे मोटरसाइकिल पर जबरन बनूड़ स्थित एक खाली मकान में ले गए, जहां उसे शराब पिलाई गई और कई लोगों ने उसकी इच्छा के विरुद्ध सामूहिक दुष्कर्म किया। इसके आधार पर 20 सितंबर 2015 को मंजीत सिंह और चार अज्ञात लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376-डी और 342 के तहत FIR दर्ज की गई।

हालांकि, जांच के दौरान पुलिस ने घटना की अलग तस्वीर पेश की। पुलिस का दावा था कि महिला आरोपियों के साथ अपनी इच्छा से गई और उनके बीच सहमति से पैसे के बदले यौन संबंध बने थे। पुलिस ने आरोप लगाया कि महिला ने अपने पति राकेश कुमार, मंजीत कौर, अजीब सिंह और जगतार सिंह के साथ मिलकर दुष्कर्म की झूठी कहानी तैयार की, ताकि आरोपियों के परिजनों से पैसे वसूले जा सकें।

जांच में पुलिस ने गवाहों के बयान, वीडियो सीडी, सीसीटीवी फुटेज और कॉल रिकॉर्ड सहित अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर भरोसा किया। पुलिस के अनुसार, अजीब सिंह ने दुष्कर्म के मामले में आरोपी बनाए गए परविंदर सिंह के परिवार से चार लाख रुपये की मांग की थी। आरोप था कि उसकी बहन से एक लाख रुपये और राकेश कुमार से पांच हजार रुपये भी लिए गए।

इसके बाद सामूहिक दुष्कर्म की शिकायत करने वाली महिला को भी आरोपी बनाते हुए उसके, अजीब सिंह और अन्य लोगों के खिलाफ अनैतिक देह व्यापार (निवारण) अधिनियम की धारा 3, 4 और 5 तथा IPC की धारा 384 (जबरन वसूली) और 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत आरोप पत्र दाखिल किया गया।

ट्रायल कोर्ट ने महिला के खिलाफ धारा 120-बी, 384 और अनैतिक देह व्यापार अधिनियम की धारा 4 व 5 के तहत आरोप तय किए। अजीब सिंह के खिलाफ धारा 384 के तहत आरोप तय हुआ। आरोपों से मुक्त किए जाने की उनकी अर्जियां खारिज होने के बाद हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की गई।

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि पुलिस ने सामूहिक दुष्कर्म की शिकायत को गलत तरीके से जबरन वसूली के मामले में बदल दिया और शिकायतकर्ता महिला को ही आरोपी बना दिया। अजीब सिंह को कथित जबरन वसूली से जोड़ने के लिए भी पर्याप्त सामग्री नहीं होने का दावा किया गया।

दूसरी ओर, राज्य और अन्य पक्षों की ओर से कहा गया कि आरोप तय करने के चरण में अदालत को साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन नहीं करना होता। गवाहों के बयान और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों सहित जांच में जुटाई गई सामग्री प्रथम दृष्टया आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त है।

हाईकोर्ट ने कहा कि आरोप तय करने के चरण में साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन नहीं किया जाता, लेकिन केवल इसलिए कोई आरोप कायम नहीं रखा जा सकता कि जांच एजेंसी ने आरोप पत्र में किसी विशेष दंड प्रावधान का उल्लेख किया। यदि आरोपों को उनके मूल रूप में स्वीकार करने के बाद भी किसी अपराध के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते हैं तो उस धारा में आरोप नहीं टिक सकता।

हालांकि, अजीब सिंह के खिलाफ जबरन वसूली के आरोप को कोर्ट ने प्रथम दृष्टया टिकाऊ माना। अदालत ने कहा कि अभियोजन ने आरोप लगाया कि उसने दुष्कर्म मामले के आरोपियों के परिजनों से पैसे की मांग की और पैसे प्राप्त भी किए। इन आरोपों के समर्थन में गवाहों के बयान और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मौजूद हैं। इनका परीक्षण मुकदमे के दौरान किया जाना है, इसलिए इस स्तर पर धारा 384 के आरोप को समाप्त नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी माना कि अजीब सिंह द्वारा महिला और अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर कथित साजिश किए जाने का आरोप होने के कारण महिला के खिलाफ धारा 120-बी के तहत आरोप भी इस चरण पर कायम रह सकता है।

हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से मंजूर करते हुए महिला के खिलाफ अनैतिक देह व्यापार (निवारण) अधिनियम की धारा 4 और 5 के तहत तय आरोप रद्द किए। वहीं अजीब सिंह के खिलाफ धारा 384 का आरोप बरकरार रखा गया। महिला के खिलाफ धारा 120-बी के साथ धारा 384 से संबंधित आरोप भी कायम रखे गए। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार मामले की आगे की कार्यवाही जारी रखने का निर्देश दिया।

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