दिव्यांग कर्मचारी की सुलभ आवास की मांग पर पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने याचिका को जनहित याचिका माना
पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने शारीरिक रूप से दिव्यांग व्यक्ति द्वारा दायर याचिका को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार की। याचिकाकर्ता ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के प्रावधानों के अनुरूप संरचनात्मक रूप से उपयुक्त और आवश्यक सुलभता संशोधनों वाले आवास के आवंटन की मांग की।
याचिकाकर्ता स्वयं अदालत में उपस्थित हुए। उन्हें दाहिने पैर में स्थायी दिव्यांगता है, जिसमें अंग का क्षीण होना और छोटा होना दाहिनी ओर की मांसपेशियों का पक्षाघात तथा कूल्हे और घुटने के जोड़ों में विकृति शामिल है। उन्हें दाहिने पैर के संबंध में 60 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता प्रमाणित की गई।
जस्टिस कुलदीप तिवारी ने कहा कि यह मामला केवल एक व्यक्ति की शिकायत तक सीमित नहीं है बल्कि पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ संघ शासित प्रदेश में कार्यरत समान रूप से दिव्यांग कर्मचारियों के अधिकारों से भी जुड़ा है।
उन्होंने कहा,
“यह मुद्दा व्यक्तिगत शिकायत से आगे बढ़कर व्यापक प्रभाव रखता है क्योंकि यह उन सभी शारीरिक रूप से दिव्यांग कर्मचारियों के अधिकारों से संबंधित है, जो राज्यों तथा उनके नियंत्रणाधीन बोर्ड, निगम और सोसायटियों में कार्यरत हैं।”
अदालत ने कहा कि याचिका में उठाया गया मुद्दा दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की योजना के अंतर्गत समग्र रूप से संबोधित है। साथ ही अधिनियम की धारा 100 के तहत बनाए गए दिव्यांगजन अधिकार नियम 2017 का भी उल्लेख किया गया।
विशेष रूप से नियम 15 पर जोर देते हुए अदालत ने कहा कि सार्वजनिक भवनों के लिए मार्च 2016 में शहरी विकास मंत्रालय द्वारा जारी बाधारहित निर्मित वातावरण संबंधी दिशानिर्देशों और मानकों का पालन अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि प्रत्येक प्रतिष्ठान को निर्धारित सुलभता मानकों का अनुपालन करना होगा और संबंधित मंत्रालयों तथा विभागों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन मानकों का पालन हो।
मामले के व्यापक प्रभाव को देखते हुए हाइकोर्ट ने पंजाब और हरियाणा राज्यों तथा चंडीगढ़ संघ शासित प्रदेश को उनके मुख्य सचिवों के माध्यम से पक्षकार बनाने का निर्देश दिया। साथ ही सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के प्रधान सचिव, सचिव या निदेशक को भी प्रतिवादी के रूप में शामिल करने का आदेश दिया गया। रजिस्ट्री को पक्षकारों के विवरण में आवश्यक संशोधन करने के निर्देश दिए गए।
मामले के महत्व और याचिकाकर्ता के स्वयं पैरवी करने को ध्यान में रखते हुए अदालत ने सीनियर एडवोकेट क्षितिज शर्मा और एडवोकेट तहाफ बैंस को न्यायमित्र नियुक्त किया ताकि वे सुनवाई में सहायता कर सकें। रजिस्ट्री को पूरी याचिका अभिलेख की प्रतियां उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया गया।
अदालत ने कहा कि चूंकि मामले में व्यापक जनहित के तत्व निहित हैं इसलिए इस याचिका को जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया जाए और प्रशासनिक पक्ष से मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उपयुक्त पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने के लिए प्रस्तुत किया जाए।