पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि पंजाबी फ़िल्म "चार्दीकला" को सर्टिफ़िकेशन देने से मना करने वाले आदेश ऐसे अधिकारी ने दिए, जिसके पास ऐसा करने का अधिकार नहीं है। यह बात तब सामने आई, जब पता चला कि जिन तारीखों पर मनाही के आदेश जारी किए गए, उन तारीखों पर सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ फ़िल्म सर्टिफ़िकेशन (CBFC) की कानूनी शक्तियों का रीजनल ऑफिसर या चेयरपर्सन के पक्ष में कोई वैध डेलीगेशन (अधिकार सौंपना) मौजूद नहीं है। [2026 LL (PH) 321]

जस्टिस हरकेश मनुजा ने कहा,

"यह स्पष्ट किया जाता है कि अपीलकर्ता द्वारा दी गई अर्ज़ी पर कोई भी आदेश पारित करने से पहले सक्षम अधिकारी द्वारा 1952 के एक्ट की धारा 4(2) के प्रावधान और भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा उक्त एक्ट की धारा 7B के तहत 29.08.2026 को पारित आदेश के अनुसार सुनवाई का मौका दिया जाना चाहिए। अपीलकर्ता को सुनवाई का मौका देने से पहले एग्ज़ामिनिंग कमेटी या रिवाइज़िंग कमेटी (जैसा भी मामला हो) के सामने मौजूद रिपोर्ट और संबंधित रिकॉर्ड अपीलकर्ता को उपलब्ध कराए जाएं, सिवाय कमेटी के सदस्यों के नामों के, जिनका खुलासा 2024 के नियमों के नियम 23 के उप-नियम (6) के तहत सुरक्षित है, ताकि वह अधिकारियों के सामने उचित तरीके से अपना पक्ष रख सके।"

अपीलकर्ता ने 12.05.2026 को CBFC की प्रायोरिटी स्कीम के तहत ज़्यादा फ़ीस देकर सिनेमैटोग्राफ़ एक्ट, 1952 की धारा 4 के तहत अपनी पंजाबी फ़िल्म "चार्दीकला" के सर्टिफ़िकेशन के लिए अर्ज़ी दी।

एग्ज़ामिनिंग कमेटी की सिफ़ारिश के बाद रीजनल ऑफिसर के हस्ताक्षर वाला 26.05.2026 का एक आदेश जारी हुआ, जिसमें सर्टिफ़िकेशन देने से मना कर दिया गया। इसका कारण यह बताया गया कि फ़िल्म का विषय "सामाजिक-राजनीतिक रूप से बहुत संवेदनशील" है, जिससे "कानून-व्यवस्था को खतरा" हो सकता था और "हत्यारे का महिमामंडन" किया गया, जिससे "सामाजिक मानदंडों का उल्लंघन" हो सकता है।

अपील पर रिविज़िंग कमिटी ने भी इसे मंज़ूरी न देने की सलाह दी। इसके बाद 14.07.2026 को रीजनल ऑफ़िसर ने एक और आदेश जारी किया, जिसमें सर्टिफ़िकेशन गाइडलाइंस के सेक्शन 5B(2) के तहत आर्टिकल्स 2(xiii), (xiv), (xv) और (xvii) के उल्लंघन का हवाला देते हुए सर्टिफ़िकेशन देने से मना कर दिया गया।

चूंकि 1952 के एक्ट की धारा 4 के तहत सर्टिफ़िकेशन देने या न देने की शक्ति बोर्ड के पास ही है। साथ ही दोनों आदेशों में बोर्ड के किसी फ़ैसले का ज़िक्र नहीं है, इसलिए कोर्ट ने 25.08.2026 के आदेश से CBFC से यह बताने को कहा कि क्या केंद्र सरकार ने एक्ट की धारा 7B के तहत बोर्ड की शक्तियां चेयरपर्सन या किसी अन्य अथॉरिटी को सौंपी थीं। साथ ही, स्थिति स्पष्ट करने के लिए भारत सरकार (सूचना और प्रसारण मंत्रालय) को भी मामले में पक्षकार बनाया गया।

इसके जवाब में मंत्रालय का 29.08.2026 का एक आदेश रिकॉर्ड पर रखा गया। इससे पता चला कि उसी तारीख से केंद्र सरकार ने धारा 7B के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए एक्ट के पार्ट II (जिसमें सेक्शन 4 भी शामिल है) के तहत बोर्ड की शक्तियां CBFC के चेयरपर्सन को सौंपी थीं।

कोर्ट ने माना कि इस डेलीगेशन ऑर्डर (शक्तियां सौंपने के आदेश) से यह साफ़ हो गया कि 26.05.2026 और 14.07.2026 को — जब सर्टिफ़िकेशन न देने के आदेश जारी किए गए — चेयरपर्सन के पास भी ऐसी कोई शक्ति नहीं थी, रीजनल ऑफ़िसर की तो बात ही छोड़ दें।

कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि एक्ट का सेक्शन 7B(2), जो केंद्र सरकार को किसी रीजनल ऑफ़िसर को अधिकृत करने की इजाज़त देता है, वह सिर्फ़ प्रोविज़नल सर्टिफ़िकेट जारी करने के सीमित मक़सद तक ही है; इसका दायरा सेक्शन 4(2)(v) के तहत सर्टिफ़िकेशन न देने तक नहीं फैला है।

Case Title: Gurkaran Singh Dhaliwal v. Central Board of Film Certification and another

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