सिर्फ़ इसलिए ज़मानत अर्ज़ी को बार-बार टालना सही नहीं कि ट्रांसफर याचिका लंबित है और कोई स्टे नहीं मिला: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि अगर हाई कोर्ट ने कोई स्टे (रोक) नहीं दिया तो ट्रायल कोर्ट की यह ज़िम्मेदारी है कि वह लंबित ज़मानत अर्ज़ी पर फ़ैसला करे। वह सिर्फ़ इसलिए सुनवाई टालती नहीं रह सकती कि किसी संबंधित ट्रांसफर याचिका का नतीजा क्या होगा।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत याचिका मंज़ूरी करते हुए जस्टिस रमेश कुमारी ने कहा कि किसी अंतरिम स्टे के अभाव में ट्रायल कोर्ट "ज़मानत अर्ज़ी पर फ़ैसला करने के लिए बाध्य है।" कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस रवैये की कड़ी आलोचना की, जिसमें वह याचिकाकर्ता की ज़मानत अर्ज़ी पर सुनवाई को बार-बार सिर्फ़ इसलिए टाल रही थी ताकि ट्रांसफर याचिका में आदेश का इंतज़ार किया जा सके।
याचिकाकर्ता (पति) और उसके परिवार के चार सदस्यों के ख़िलाफ़ 23 जून, 2026 को महिला पुलिस स्टेशन, सिरसा में FIR दर्ज की गई। यह FIR पत्नी की शिकायत पर वैवाहिक विवाद के बाद IPC की धाराओं 498-A, 323, 406, 506, 420, 354-A और 34 (जो BNS की धाराओं 85, 115(2), 316(2), 351, 318(4), 75 और 3(5) के बराबर हैं) के तहत दर्ज की गई। इस जोड़े की शादी नवंबर 2023 में हुई।
सिरसा के एडिशनल सेशंस जज (फ़ास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट) ने परिवार के चार सह-आरोपियों को 10 जुलाई और 18 जुलाई, 2026 के आदेशों के ज़रिए अंतरिम अग्रिम ज़मानत दी। इसके बाद शिकायतकर्ता ने उनकी ज़मानत अर्जियों को ट्रांसफर कराने के लिए हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन उस याचिका में कोई स्टे नहीं दिया गया।
याचिकाकर्ता की अपनी अग्रिम ज़मानत अर्ज़ी 24 जुलाई, 2026 को दायर की गई और उसी दिन नोटिस जारी किया गया था। वकील ने बताया कि कई मौके मिलने के बावजूद अर्ज़ी पर फ़ैसला नहीं किया गया। जब याचिकाकर्ता ने इस पर फ़ैसले के लिए अर्ज़ी दी तो ट्रायल कोर्ट ने 14 सितंबर, 2026 को उस अर्ज़ी को यह कहते हुए खारिज किया कि ट्रांसफर याचिका हाई कोर्ट में लंबित है।
शिकायतकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि ट्रांसफर याचिकाओं पर अभी कोई फ़ैसला नहीं हुआ। चूंकि ट्रायल कोर्ट ने सह-आरोपी को पहले ही अंतरिम राहत दी थी, इसलिए पति की ज़मानत अर्ज़ी पर फ़ैसला करने से उनके मुवक्किल के हितों पर बुरा असर पड़ सकता है।
इसे खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रांसफर याचिका में कोई रोक (स्टे) नहीं लगाई गई और ज़मानत अर्ज़ी सिर्फ़ इसी वजह से लंबित है। 14 सितंबर का आदेश रद्द करते हुए कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के पांच कामकाजी दिनों के भीतर ज़मानत अर्ज़ी पर फ़ैसला करे। यह फ़ैसला दोनों पक्षों को सुनने और पार्टियों द्वारा रिकॉर्ड पर रखे गए सभी दस्तावेज़ों पर उचित रूप से विचार और चर्चा करने के बाद लिया जाना चाहिए।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की अन्य मांगों को भी खारिज किया, जिनमें गिरफ्तारी पर रोक और कठोर कार्रवाई न करने का निर्देश शामिल है। कोर्ट ने कहा कि इन मांगों पर विचार करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि ज़मानत अर्ज़ी पर ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार फ़ैसला करना है।
Case Title: Parteek Goel v. State of Haryana and Another