Factory Blast | पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने धारूहेड़ा फैक्ट्री आग मामले में गैर-इरादतन हत्या के आरोप खारिज किए
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने धारूहेड़ा में 2024 में हुई फैक्ट्री आग की घटना, जिसमें कई मजदूरों की मौत हो गई थी, उसके आरोपी पर लगाए गए 'गैर-इरादतन हत्या' (जो हत्या की श्रेणी में नहीं आती) और 'गैर-इरादतन हत्या की कोशिश' के आरोपों को रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्टया गंभीर अपराधों के लिए जरूरी इरादा या जानकारी का पता नहीं चलता।
जस्टिस वीरेंद्र अग्रवाल ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने नेशनल सेफ्टी काउंसिल की एक्सपर्ट रिपोर्ट और CCTV फुटेज पर विचार करने से इनकार करके गलती की, सिर्फ इसलिए कि उन्हें औपचारिक रूप से साबित नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि ऐसा नजरिया "ट्रायल के चरण में लागू होने वाले मानक और चार्ज पर विचार करने के मानक को गलत तरीके से एक-दूसरे में मिलाने जैसा है।"
16 मार्च 2024 को रेवाड़ी जिले के धारूहेड़ा में लाइफलोंग इंडिया फैक्ट्री में आग लग गई, जिसमें कई मजदूर झुलस गए। FIR के अनुसार, घायल शिकायतकर्ता ने घटना के लिए बॉयलर डस्ट कलेक्टर के फटने को जिम्मेदार ठहराया और कंपनी के मालिकों, अधिकारियों और ठेकेदार की लापरवाही को दोषी माना, जिन्होंने उपकरण के रखरखाव और इमरजेंसी गेट को बंद रखने में लापरवाही बरती थी।
शुरुआत में FIR IPC की धारा 287, 337 और 34 के तहत दर्ज की गई। जांच के दौरान कई घायल मजदूरों की मौत के बाद IPC की धारा 308 और 304 पार्ट II जोड़ी गईं। पुलिस की फाइनल रिपोर्ट में कहा गया कि डस्ट कलेक्टर पहले भी दो बार फट चुका था, ठेकेदार, मालिकों और अधिकारियों को मरम्मत की जरूरत के बारे में बताया गया। समय पर कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए।
6 मार्च 2026 के आदेश द्वारा एडिशनल सेशन जज, रेवाड़ी ने IPC की धारा 287, 304 पार्ट II और 308 (धारा 34 के साथ) के तहत, और वैकल्पिक रूप से IPC की धारा 304-A के तहत आरोप तय किए। याचिकाकर्ताओं ने FIR, फाइनल रिपोर्ट और आरोप तय करने का आदेश रद्द करने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ताओं के सीनियर वकील ने दलील दी कि यह घटना तकनीकी कारणों, जैसे कि बिजली की खराबी और जमा हुई ज्वलनशील धूल, की वजह से हुआ एक दुर्भाग्यपूर्ण औद्योगिक हादसा था। उन्होंने कहा कि नेशनल सेफ्टी काउंसिल की रिपोर्ट में उन पर किसी भी तरह की लापरवाही या गलती का आरोप नहीं लगाया गया।
यह भी तर्क दिया गया कि फैक्ट्री सभी ज़रूरी मंज़ूरी के साथ चल रही थी, सुरक्षा में कोई भी चूक 'फैक्ट्रीज़ एक्ट, 1948' के खास नियमों के दायरे में आती थी और ट्रायल कोर्ट ने हर आरोपी की अलग-अलग भूमिका की जांच किए बिना ही सामान्य आरोपों के आधार पर आरोप तय कर दिए।
राज्य ने तर्क दिया कि ये मामले ट्रायल के दौरान सबूतों से जुड़े हैं; घायल गवाहों के बयान, मेडिकल सबूत और कई मज़दूरों की मौत से पहली नज़र में सुरक्षा में गंभीर चूक का पता चलता है; और कानूनी मंज़ूरी मिलने से आरोपी बरी नहीं हो जाते। यह भी तर्क दिया गया कि 'फैक्ट्रीज़ एक्ट' किसी की जान जाने से जुड़े अलग-अलग अपराधों के लिए IPC के तहत मुकदमा चलाने से नहीं रोकता है।
Case Title: Parmod Kumar Yadav and Others v. State of Haryana