पैसेंजर ट्रेन में बम धमाका रेलवे एक्ट के तहत 'हादसा', रेलवे मुआवज़ा देने के लिए ज़िम्मेदाक: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

Update: 2026-06-22 14:56 GMT

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने पैसेंजर ट्रेन में बम धमाके के पीड़ितों को मुआवज़ा देने के लिए भारत सरकार (यूनियन ऑफ़ इंडिया) की ज़िम्मेदारी बरकरार रखी। कोर्ट ने कहा कि ऐसी घटना रेलवे एक्ट, 1989 की धारा 124 के तहत "हादसे" की परिभाषा में आती है। [2026 LiveLaw (PH) 204]

जस्टिस पंकज जैन ने कहा,

"एक बार यह तय हो जाने के बाद कि ट्रेन में आग या धमाका 'हादसे' की परिभाषा में आता है तो भारत सरकार ट्रेन/रेलवे स्टेशन पर बम धमाके से हुई मौत के लिए मुआवज़ा देने की अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकती।"

कोर्ट ने भारत सरकार की कई अपीलें खारिज कीं, जिनमें रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल द्वारा धमाके में मारे गए यात्रियों के परिवारों को दिए गए मुआवज़े के आदेश को चुनौती दी गई।

यह मामला 8 फरवरी, 1992 को टोहाना से जींद जा रही 24-डाउन जनता एक्सप्रेस में हुए बम धमाके से जुड़ा है। इस धमाके में कई लोगों की मौत हुई और कई घायल हुए। एक्सप्लोसिव सब्सटेंस एक्ट, TADA, IPC और रेलवे एक्ट के प्रावधानों के तहत FIR दर्ज की गई।

मृतक यात्रियों के परिवारों, जिनमें उषा सिंगला, शकुंतला देवी और संतोष जैन शामिल थीं, उन्होंने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के सामने कई याचिकाएं दायर कीं। ट्रिब्यूनल ने मुआवज़ा देते हुए कहा कि यह घटना रेलवे एक्ट की धारा 124 के तहत "हादसा" मानी जाएगी।

इससे असंतुष्ट होकर भारत सरकार ने अपील दायर की और तर्क दिया कि बम धमाका "अनचाही घटना" (untoward incident) या हादसे की कानूनी परिभाषा में नहीं आता है। इसलिए रेलवे पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।

कोर्ट ने इस बात पर विचार किया कि क्या चलती ट्रेन के अंदर बम धमाका रेलवे एक्ट की धारा 124 के तहत "हादसा" माना जाएगा, जिससे मुआवज़े के लिए सख्त ज़िम्मेदारी (strict liability) बनती है।

कोर्ट ने रेलवे एक्ट की धारा 124 की जाँच की, जो रेलवे पर यह सख्त ज़िम्मेदारी डालती है कि वह "हादसे" के कारण हुई मौत या चोट के लिए यात्रियों को मुआवज़ा दे, चाहे गलती किसी की भी हो। इसमें नॉर्दर्न रेलवे के 'एक्सीडेंट मैनुअल' का भी सहारा लिया गया, जिसमें ट्रेन दुर्घटनाओं को इस तरह बांटा गया कि उनमें आग, धमाका और ऐसी दूसरी गंभीर घटनाएं शामिल हों, जिनसे जान-माल का नुकसान या चोट लगी हो।

इसके अलावा, कोर्ट ने 'यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम सुनील कुमार घोष (1984) 4 SCC 246' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का ज़िक्र किया। इस फ़ैसले में बताया गया कि दुर्घटना एक ऐसी अनपेक्षित और अचानक होने वाली घटना है जिसकी आम तौर पर रेल यात्रा के दौरान उम्मीद नहीं की जाती।

इन बातों को ध्यान में रखते हुए जज ने कहा कि ट्रिब्यूनल के इस निष्कर्ष में दखल देने की कोई वजह नहीं है कि चलती ट्रेन में बम धमाके से यात्रियों की मौत के लिए प्रशासन मुआवज़ा देने का ज़िम्मेदार है।

इसलिए ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए मुआवज़े में बदलाव किया गया। कोर्ट ने कहा कि दावा करने वाले दुर्घटना की तारीख पर लागू मुआवज़े के हकदार हैं। साथ ही उन्हें दावा याचिका दायर करने की तारीख से लेकर असल में मुआवज़ा मिलने की तारीख तक 9% सालाना की दर से ब्याज भी मिलेगा।

Title: UNION OF INDIA v. USHA SINGLA AND OTHERS

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