चीफ जस्टिस पर सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर सौरव दास के खिलाफ आपराधिक अवमानना याचिका, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में सुनवाई का इंतजार
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में CJP के प्रवक्ता सौरव दास के खिलाफ आपराधिक अवमानना याचिका दायर की गई। याचिका में आरोप लगाया गया कि 20 अगस्त को 'X' पर किए गए उनके पोस्ट में हाईकोर्ट और तत्कालीन एक्टिंग चीफ जस्टिस, अब चीफ जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा की निष्पक्षता, निष्ठा और अधिकार पर गंभीर सवाल उठाए गए।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि पोस्ट में महंगाई भत्ते के बकाये के भुगतान से जुड़े डिवीजन बेंच के फैसले को राजनीतिक मंशा से जोड़कर पेश किया गया और अदालत की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई।
यह याचिका प्रैक्टिस कर रहे वकील नितिन गर्ग ने संविधान के अनुच्छेद 215 और अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(सी), 12 और 15 के तहत दायर की है। याचिका अभी सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुई।
याचिका के अनुसार, दास के पोस्ट में आरोप लगाया गया कि तत्कालीन कार्यवाहक चीफ जस्टिस ने लंबित मामले को कथित तौर पर एक अन्य स्वतंत्र पीठ से वापस लेकर अपने समक्ष सुनवाई के लिए रखा। पोस्ट में इसे रोस्टर का उल्लंघन बताया गया और यह आरोप लगाया गया कि डिवीजन बेंच का फैसला पंजाब सरकार के खिलाफ राजनीतिक रूप से प्रेरित था, क्योंकि सरकार को भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के तौर पर पेश किया गया।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, पोस्ट में यह दावा भी किया गया कि फैसले से पंजाब सरकार पर करीब 20 हजार करोड़ रुपये की देनदारी पैदा हो गई और अदालत ने अनुपालन की अवधि को मनमाने ढंग से 30 दिन से घटाकर 15 दिन कर दिया, जिससे सरकार के लिए आदेश का पालन करना व्यावहारिक रूप से मुश्किल हो गया।
याचिका में कहा गया कि पोस्ट में जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा की चीफ जस्टिस पद पर नियुक्ति की सिफारिश और इस फैसले के बीच कथित संबंध का संकेत देते हुए सवाल उठाया गया कि क्या दोनों घटनाएं महज संयोग थीं।
याचिका में आरोप लगाया गया कि पोस्ट में पूर्व चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस की पदोन्नति की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए और यह संकेत दिया गया कि न्यायपालिका का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि किसी फैसले की निष्पक्ष और कड़ी आलोचना संविधान के तहत संरक्षित है, लेकिन जस्टिस की नीयत पर सवाल उठाना, उन्हें बेईमान या राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित बताना, कथित राजनीतिक सौदेबाजी का संकेत देना और तथ्यों को गलत तरीके से पेश करना निष्पक्ष आलोचना के दायरे में नहीं आता।
याचिका में 20 हजार करोड़ रुपये की कथित देनदारी के दावे को भी भ्रामक बताया गया। याचिकाकर्ता का कहना है कि डिवीजन बेंच ने कोई नई देनदारी पैदा नहीं की थी, बल्कि सिंगल बेंच के आदेश की पुष्टि की थी। याचिका के अनुसार, पंजाब सरकार ने खुद संभावित देनदारी करीब 14 से 15 हजार करोड़ रुपये आंकी थी। ऐसे में 20 हजार करोड़ रुपये का आंकड़ा वास्तविक स्थिति से अधिक बताया गया और इसे फैसले के खिलाफ लोगों में आक्रोश पैदा करने वाला दावा बताया गया।
अनुपालन की समयसीमा को लेकर भी याचिकाकर्ता ने पोस्ट में किए गए दावे को गलत बताया। याचिका के मुताबिक, सिंगल बेंच ने 30 जून को अनुपालन के लिए जो समयसीमा तय की थी, वह एलपीए लंबित रहने के दौरान ही समाप्त हो चुकी थी। डिवीजन बेंच के फैसले के पैराग्राफ 127 का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया कि अदालत ने केवल समयसीमा में बदलाव किया। फैसले में तीन अगस्त से अनुपालन के लिए नई 15 दिन की अवधि दी गई। इसलिए यह कहना सही नहीं था कि अदालत ने किसी चल रही 30 दिन की अवधि को मनमाने ढंग से घटाकर 15 दिन किया।
याचिका में जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति को लेकर पोस्ट में इस्तेमाल किए गए कथित शब्दों पर भी आपत्ति जताई गई। याचिकाकर्ता का कहना है कि 31 अगस्त तक उनकी नियुक्ति की अधिसूचना जारी नहीं हुई और पंजाब सरकार ने भी अपनी टिप्पणियां दाखिल नहीं की थीं। ऐसे में नियुक्ति को पहले ही पूरी हो चुकी प्रक्रिया के तौर पर पेश करना तथ्यात्मक रूप से गलत था। याचिका में आरोप लगाया गया कि इस तरह की प्रस्तुति से डिवीजन बेंच और राजनीतिक कार्यपालिका के बीच किसी कथित समझौते का संकेत जाता है और इससे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर जनता के मन में संदेह पैदा हो सकता है।
मामले की सुनवाई और पीठ के गठन को लेकर लगाए गए रोस्टर उल्लंघन के आरोप पर भी याचिकाकर्ता ने आपत्ति जताई है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम प्रकाश चंद और कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के फैसलों का हवाला दिया गया।
याचिका में कहा गया कि हाईकोर्ट में पीठों का गठन और मामलों का आवंटन चीफ जस्टिस के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र का हिस्सा है। ऐसे में कई बार सुनवाई और मामला सुरक्षित किए जाने के बाद एलपीए मामलों की सुनवाई कार्यवाहक चीफ जस्टिस की पीठ द्वारा किए जाने को रोस्टर का उल्लंघन बताना संवैधानिक पद के अधिकार और हाईकोर्ट की संस्थागत गरिमा को कमजोर करने वाला है।
याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि संबंधित पोस्ट को बड़े पैमाने पर प्रसारित होने के उद्देश्य से लिखा गया था और उसे हजारों लोगों ने पसंद किया, पुनर्प्रसारित किया और उस पर प्रतिक्रियाएं दीं। याचिका में कहा गया कि सोशल मीडिया पर प्रकाशित सामग्री लंबे समय तक खोजी और साझा की जा सकती है। इसलिए इस तरह के आरोपों का असर केवल तत्काल प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रहता, बल्कि न्यायपालिका के प्रति जनता के विश्वास पर भी स्थायी प्रभाव पड़ सकता है।
याचिका में दिल्ली हाईकोर्ट के वर्ष 2026 के दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन बनाम कपिल कक्कड़ मामले के फैसले का भी हवाला दिया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, इस फैसले में मौजूदा जस्टिस पर अनुचित मंशा के आरोप लगाने वाली सोशल मीडिया सामग्री को निष्पक्ष आलोचना के दायरे से बाहर माना गया और ऐसी सामग्री को हटाने तथा अवमानना की कार्यवाही की जरूरत पर जोर दिया गया।
वकील नितिन गर्ग ने हाईकोर्ट से सौरव दास के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने और उन्हें नोटिस जारी करने की मांग की। याचिका में संबंधित पोस्ट और उसके पुनर्प्रकाशनों को हटाने का निर्देश देने के साथ उसी माध्यम और समान प्रमुखता से सार्वजनिक माफी प्रकाशित कराने की मांग की गई। इसके अलावा भविष्य में हाईकोर्ट को बदनाम करने वाली ऐसी सामग्री प्रकाशित करने से रोकने, उदाहरणीय जुर्माना लगाने और दोषसिद्धि की स्थिति में अवमानना अधिनियम की धारा 12 के तहत छह महीने तक की साधारण कैद और जुर्माने समेत कानून के अनुसार उचित सजा देने की मांग की गई।
फिलहाल याचिका पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में दाखिल हो चुकी है, लेकिन इस पर अदालत में सुनवाई नहीं हुई है। मामला कब सूचीबद्ध होगा और अदालत इस पर क्या रुख अपनाती है, यह आगे की कार्यवाही में स्पष्ट होगा।