[O.6 R.1 CPC] प्रतिवादी को साक्ष्य में दर्ज दस्तावेज़ के सामने आने पर खामियों को भरने के लिए दलीलों में देरी से संशोधन करने से रोका गया: पटना हाइकोर्ट

Update: 2024-03-26 07:23 GMT

पटना हाइकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश VI नियम 1 के प्रावधान पर अपने विचार-विमर्श में कहा कि यदि प्रतिवादियों को उनके साक्ष्य प्रस्तुत करने के दौरान कोई दस्तावेज मिलता है तो उन्हें अपने मामले में कमियों को दूर करने के लिए अपनी दलीलों में संशोधन करने का अधिकार नहीं दिया जाएगा।

इस मामले की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस अरुण कुमार झा ने कहा,

"यदि प्रतिवादियों के लिए साक्ष्य दर्ज किए जाने के दौरान कोई दस्तावेज आया और प्रतिवादियों को उससे सामना कराया जाता है तो इससे प्रतिवादियों को अपने मामले में कमी को पूरा करने के लिए अपनी दलीलों में संशोधन करने का अधिकार नहीं मिलता। इसके अलावा संशोधन काफी देरी से पेश किया गया और आदेश VI नियम 1 का प्रावधान स्पष्ट रूप से ट्रायल शुरू होने के बाद और जब कोई उचित परिश्रम नहीं दिखाया गया तो ऐसे संशोधन पर रोक लगाता है।”

उपरोक्त निर्णय मधेपुरा के उप न्यायाधीश-V द्वारा टाइटल सूट में पारित आदेश रद्द करने के लिए दायर याचिका में आया, जिसके द्वारा उप न्यायाधीश ने प्रतिवादी नंबर 1 के लिखित बयान में संशोधन के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश VI नियम 1 के तहत दायर आवेदन खारिज कर दिया।

मामले के तथ्यों के अनुसार वादीगण ने टाइटल सूट शुरू किया, जिस पर प्रतिवादी नंबर 1 ने लिखित बयान प्रस्तुत करके जवाब दिया। वादीगण के दावे का सार सेल्स एग्रीमेंट पर आधारित है, जिसका प्रतिवादी नंबर 1 ने विरोध किया।

9 मई, 2016 को बचाव पक्ष के गवाह के रूप में प्रतिवादी नंबर 1 की क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान यह बात सामने आई कि सेल्स एग्रीमेंट के रूप में उसके सामने प्रस्तुत दस्तावेज उस दस्तावेज से भिन्न था, जिस पर उसने हस्ताक्षर करके अपने भाई को सौंपा था। क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान प्रस्तुत दस्तावेज केवल 10 कट्ठा भूमि की बिक्री से संबंधित है, जबकि मूल रूप से उसने जो दस्तावेज तैयार किया, वह उससे भिन्न है।

इस विसंगति को महसूस करने पर प्रतिवादी नंबर 1 ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VI नियम 1 के तहत अपने लिखित बयान में संशोधन करने की मांग की। हालांकि वादीगण द्वारा अपने प्रत्युत्तर में संशोधन के लिए आवेदन को चुनौती दी गई। इसके बाद अधीनस्थ न्यायालय ने सुनवाई के बाद प्रतिवादी नंबर 1 का आवेदन खारिज कर दिया।

प्रतिवादी नंबर 1 ने संशोधन के लिए अपना आवेदन खारिज करने को चुनौती देते हुए हाइकोर्ट के समक्ष इस निर्णय की अपील की।

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि यदि न्यायालय पक्षकारों के बीच वास्तविक विवाद का निर्धारण करना आवश्यक समझता है तो किसी भी स्तर पर संशोधन की अनुमति दी जानी चाहिए। इस तरह के संशोधन की अनुमति न देने से प्रतिवादी नंबर 1 /याचिकाकर्ता को अपूरणीय क्षति होगी।

इसके अलावा वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने इस तथ्य को नजरअंदाज किया कि प्रतिवादी नंबर 1 ने वादीगण को विवादित भूमि बेचने के किसी भी समझौते से इनकार करते हुए लिखित बयान दायर किया।

याचिकाकर्ता के वकील के अनुसार यह प्रतिवादी नंबर 2 है, जिसने वादीगण के साथ बिक्री का समझौता किया। प्रतिवादी नंबर 2 ने बाद में प्रतिवादी नंबर 1 से समझौते पर हस्ताक्षर करने का अनुरोध किया यह दावा करते हुए कि उसे धन की आवश्यकता है और वह अपनी 10 कट्ठा भूमि का हिस्सा बेचना चाहता है।

परिणामस्वरूप प्रतिवादी नंबर 1 ने समझौते के केवल पहले पृष्ठ पर हस्ताक्षर किए।

वकील ने इस बात पर जोर दिया कि सेल्स एग्रीमेंट केवल प्रतिवादी नंबर 2 और वादी के बीच किया गया, जिसमें प्रतिवादी नंबर 1 सीधे तौर पर शामिल नहीं था।

इसलिए प्रतिवादी नंबर 1 द्वारा वादी के साथ किसी भी समझौते से इनकार करने को इस संदर्भ में समझा जाना चाहिए। जब ​​समझौता प्रस्तुत किया गया तो प्रतिवादी नंबर 1 ने परिस्थितियों को स्पष्ट करने की मांग की और अपने लिखित बयान में संशोधन का प्रस्ताव रखा।

हालांकि इन महत्वपूर्ण विवरणों को कथित तौर पर अधीनस्थ न्यायालय द्वारा अनदेखा किया गया।

अभिलेखों विशेष रूप से विवादित आदेश का अवलोकन करने के बाद न्यायालय ने कहा कि उसे विवादित आदेश या अधिकार क्षेत्र के अनुचित प्रयोग में कोई अनियमितता या अवैधता नहीं मिली।

न्यायालय ने कहा,

"यह रिकॉर्ड में है कि संशोधन याचिका पंद्रह साल बाद पेश की गई, जब दोनों पक्षों, वादी और प्रतिवादी के साक्ष्य पूरे हो चुके है और मामला बहस के चरण में है। इसके अलावा, यह देखा जा सकता है कि उक्त संशोधन केवल इस आधार पर किया गया कि प्रतिवादियों से कुछ प्रश्न पूछे गए और उनके जवाब के लिए कुछ दस्तावेज उनके समक्ष रखे गए, तभी उन्होंने लिखित बयान में संशोधन के लिए न्यायालय के समक्ष आवेदन किया।"

न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए निष्कर्ष निकाला,

“उपर्युक्त तथ्यों और परिस्थितियों में मुझे आरोपित आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता और इसकी पुष्टि की जाती है।”

केस टाइटल: शिब्जी पंडित सिंह बनाम मंजू देवी एवं अन्य

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