'जन्म से प्राप्त जातिगत दर्जे को नकारा नहीं जा सकता': पटना हाईकोर्ट ने पति का नाम होने के कारण SC आरक्षण की मांग करने वाली महिला को दी राहत
पटना हाईकोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति (SC) श्रेणी की किसी उम्मीदवार को केवल इसलिए आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसके जाति प्रमाण पत्र में पिता के नाम की जगह पति का नाम दर्ज है, जबकि भर्ती विज्ञापन में ऐसी कोई शर्त नहीं रखी गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जाति प्रमाण पत्र केवल किसी व्यक्ति की जाति की पुष्टि करता है, जो उसे जन्म से ही प्राप्त होती है।
जस्टिस मोहित कुमार शाह और जस्टिस सुरेंद्र पांडे की खंडपीठ ने बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की वह अपील खारिज की, जिसमें सिंगल जज के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें महिला उम्मीदवार को SC श्रेणी के तहत असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति के लिए विचार करने का निर्देश दिया गया था।
यह विवाद BPSC द्वारा जारी विज्ञापन संख्या 20/2017 से शुरू हुआ, जो मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में 74 असिस्टेंट प्रोफेसरों की भर्ती के लिए था। इसमें SC उम्मीदवारों के लिए 13 पद आरक्षित हैं, जिनमें से पांच पद महिलाओं के लिए तय किए गए।
याचिकाकर्ता डॉ. सुषमा शरण ने SC श्रेणी के तहत 'प्रसूति एवं स्त्री रोग' (Obstetrics and Gynecology) विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के लिए आवेदन किया था। उन्होंने उप-विभागीय अधिकारी (SDO) द्वारा 2 अगस्त 2006 को जारी किया गया जाति प्रमाण पत्र जमा किया। आवेदन की जांच और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद वह 28 फरवरी 2018 को इंटरव्यू के लिए उपस्थित हुईं। हालांकि, जब 8 अगस्त 2019 को परिणाम घोषित किए गए तो SC श्रेणी के तहत चयनित उम्मीदवारों की सूची में उनका नाम नहीं था।
BPSC का तर्क था कि उनके आवेदन पर 'अनारक्षित' (सामान्य) श्रेणी के तहत विचार किया गया, लेकिन मेरिट में पीछे रहने के कारण उनका चयन नहीं हो सका। आयोग के अनुसार, ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनके द्वारा जमा किए गए जाति प्रमाण पत्र में पिता के नाम की जगह पति का नाम दर्ज था।
इससे व्यथित होकर उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और बताया कि वह जन्म से ही SC श्रेणी से संबंधित हैं, क्योंकि वह स्वर्गीय महीम चंद राम की बेटी हैं। उन्होंने 17 अगस्त 2019 को पटना सदर के सर्कल ऑफिसर द्वारा जारी एक बाद के जाति प्रमाण पत्र का भी सहारा लिया, जिसमें उनके पिता का नाम दर्ज था।
सिंगल जज ने 14 फरवरी 2023 को उनकी रिट याचिका को स्वीकार किया। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वह उनकी उम्मीदवारी पर SC श्रेणी के तहत मेरिट के आधार पर विचार करें। यदि वह योग्य पाई जाती हैं, तो उन्हें उसी तारीख से नियुक्ति दी जाए, जिस तारीख से कम मेरिट वाले अन्य उम्मीदवारों को नियुक्ति दी गई थी। हालांकि, यह फैसला निर्णय में बताए गए 'परिणामी लाभों' (Consequential Benefits) की सीमाओं के अधीन होगा।
इस निर्देश को चुनौती देते हुए BPSC ने डिवीजन बेंच का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने मुख्य मुद्दा यह माना कि क्या उम्मीदवार के पिता का नाम न होने और उसके बजाय पति का नाम होने के कारण उसे 'अनारक्षित श्रेणी' (Unreserved Category) में रखा जाना सही था।
इस सवाल का नकारात्मक जवाब देते हुए बेंच ने कहा:
"विज्ञापन संख्या 20/2007 में दी गई सभी शर्तों को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इसमें ऐसी कोई शर्त नहीं है, जिसके अनुसार SC/ST उम्मीदवार द्वारा जमा किए जाने वाले जाति प्रमाण पत्र में उम्मीदवार के पिता का ही नाम होना चाहिए, न कि किसी विवाहित महिला उम्मीदवार के पति का नाम।"
कोर्ट ने इस बात पर भी विचार किया कि क्या 2006 में सब-डिविजनल ऑफिसर द्वारा जारी किया गया जाति प्रमाण पत्र उनके SC दर्जे को साबित कर सकता है, खासकर तब जब उन्होंने बाद में सर्कल ऑफिसर से एक और प्रमाण पत्र प्राप्त कर लिया था।
'ब्रज किशोर प्रसाद' मामले में फुल बेंच के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि रिट कोर्ट की शक्तियां सीमित नहीं हैं और उचित मामलों में राहत दी जा सकती है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि बेंच ने कहा:
"यह एक स्थापित कानून है कि सक्षम अधिकारी द्वारा जारी किया गया प्रमाण पत्र—जो यह बताता है कि कोई व्यक्ति जन्म से अनुसूचित जाति (SC) श्रेणी का है—केवल एक ऐसी सच्चाई की पुष्टि करता है जो पहले से ही मौजूद है..."
कोर्ट ने गौर किया कि BPSC ने प्रतिवादी (Respondent) के SC दर्जे पर कोई सवाल नहीं उठाया। कोर्ट ने यह भी देखा कि मूल प्रमाण पत्र जारी करने वाले सब-डिविजनल ऑफिसर का पद, सर्कल ऑफिसर से ऊंचा था। इसके अलावा, प्रतिवादी ने बाद में एक और प्रमाण पत्र भी पेश किया, जिसमें उनके पिता का नाम दर्ज है। संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत आरक्षण के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए पीठ ने माना कि प्रतिवादी की उम्मीदवारी को केवल ऐसी तकनीकी आवश्यकताओं के आधार पर SC श्रेणी के अंतर्गत खारिज नहीं किया जा सकता, जिनका वास्तव में कोई अस्तित्व ही नहीं है।
सिंगल जज के फैसले में कोई कमी न पाते हुए हाईकोर्ट ने BPSC की अपील खारिज की और प्रतिवादी को SC श्रेणी के तहत नियुक्ति के लिए विचार करने का निर्देश बरकरार रखा।
Case Title : The Bihar Public Service Commission through the Secretary, Bailey Road, Patna and Another v. Dr. Sushma Sharan and Ors