मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि POCSO मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायिक अधिकारियों को बाल पीड़ित के साथ rapport बनाकर उसे अदालत में सहज महसूस कराना चाहिए। जज को बच्चे की मनोदशा समझते हुए सहानुभूति और संवेदनशीलता के साथ सच्चाई सामने लाने का प्रयास करना चाहिए।

जस्टिस भरत चक्रवर्ती ने कहा कि बच्चे से पूछे जाने वाले शुरुआती सवाल केवल औपचारिकता नहीं हैं, बल्कि उनका उद्देश्य बच्चे के साथ विश्वास का रिश्ता बनाना है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन और बचाव पक्ष के सवालों को बच्चे के अनुकूल भाषा में दोबारा तैयार कर पूछा जाना चाहिए।

यह टिप्पणी एक POCSO मामले में आई, जहां विशेष अदालत ने अभियोजन की मांग पर बाल पीड़ित को दोबारा गवाही के लिए बुलाने की अनुमति दी थी। हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे को बार-बार अदालत बुलाना उसे दोबारा मानसिक आघात यानी secondary victimisation की स्थिति में डाल सकता है।

कोर्ट ने विशेष अदालत का recall आदेश रद्द करते हुए कहा कि बच्चे का सर्वोत्तम हित सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए। हालांकि, अभियोजन को अन्य साक्ष्यों के जरिए मामले को कानून के अनुसार साबित करने की स्वतंत्रता दी गई है।

कोर्ट ने Tamil Nadu State Judicial Academy को child witnesses से व्यावहारिक तरीके से निपटने और उनकी examination के संबंध में न्यायिक अधिकारियों को विशेष प्रशिक्षण देने का सुझाव भी दिया।

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