भरण-पोषण बकाया होने पर पति की पेंशन रोकने की मांग खारिज, मद्रास हाईकोर्ट ने कहा- हाईकोर्ट को फैमिली कोर्ट नहीं बनाया जा सकता

Update: 2026-06-12 08:27 GMT

मद्रास हारेकोर्ट ने एक महिला की उस याचिका को खारिज किया, जिसमें उसने अपने पति द्वारा भरण-पोषण की राशि का भुगतान नहीं किए जाने का हवाला देते हुए उसकी पेंशन और सेवा निवृत्ति लाभों के वितरण पर रोक लगाने की मांग की थी।

जस्टिस मुम्मिनेनी सुधीर कुमार ने स्पष्ट कहा कि हाईकोर्ट को न तो निष्पादन अदालत और न ही फैमिली कोर्ट में बदला जा सकता है।

अदालत ने कहा कि यदि महिला को भरण-पोषण मामले में उसके पक्ष में आदेश मिला है और उसका पालन नहीं किया गया है, तो उसे संबंधित आदेश के क्रियान्वयन के लिए विधि सम्मत प्रक्रिया अपनानी चाहिए।

अदालत ने कहा,

"हाईकोर्ट को निष्पादन अदालत या फैमिली कोर्ट नहीं बनाया जा सकता। यदि याचिकाकर्ता भरण-पोषण मामले में सफल हुई है तो आदेश के पालन के लिए उसे उचित कानूनी कार्यवाही शुरू करनी होगी। वह इस रिट याचिका के माध्यम से न तो आदेश का क्रियान्वयन करा सकती है और न ही पति-पत्नी के विवाद का निपटारा करवा सकती है।"

मामले के अनुसार पति-पत्नी के वैवाहिक संबंधों में तनाव आने के बाद महिला ने भरण-पोषण के लिए फैमिली कोर्ट और दीवानी अदालत में विभिन्न मामले दायर किए। अदालतों ने महिला के पक्ष में आदेश पारित करते हुए पति को भरण-पोषण राशि देने का निर्देश दिया था।

महिला का आरोप है कि इन आदेशों का पालन नहीं किया गया। इसके बाद उसने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर तमिलनाडु राज्य परिवहन निगम कर्मचारी पेंशन कोष ट्रस्ट के प्रशासक और निगम के महाप्रबंधक को निर्देश देने की मांग की कि वे उसके पति को देय पेंशन और अन्य सेवा निवृत्ति लाभों का भुगतान न करें।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि महिला की शिकायत सरकारी अधिकारियों के खिलाफ नहीं, बल्कि उसके पति के खिलाफ है।

अदालत ने कहा कि संबंधित अधिकारियों द्वारा महिला के किसी वैधानिक या संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं किया गया।

इसी आधार पर अदालत ने याचिका को सुनवाई योग्य नहीं मानते हुए खारिज कर दिया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि महिला अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सक्षम मंच के समक्ष उचित कानूनी कार्यवाही शुरू करने के लिए स्वतंत्र है और वह कानून के अनुसार उपलब्ध अन्य उपायों का सहारा ले सकती है।

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