वैवाहिक विवाद में पति के हर रिश्तेदार को नहीं बना सकते आरोपी, ठोस आरोप के बिना मुकदमा नहीं चलेगा: मद्रास हाईकोर्ट

Update: 2026-06-15 13:40 GMT

मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद होने मात्र से पति के प्रत्येक रिश्तेदार के खिलाफ आपराधिक मामला नहीं चलाया जा सकता।

अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए के तहत पति के परिजनों के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप सामान्य, अस्पष्ट और बिना किसी ठोस साक्ष्य के थे।

जस्टिस विक्टोरिया गौरी ने कहा,

"पति-पत्नी के बीच वैवाहिक मतभेद होने मात्र से पति के हर रिश्तेदार के खिलाफ आपराधिक कानून का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।"

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आपराधिक न्याय प्रक्रिया का उद्देश्य वास्तविक पीड़ित को संरक्षण देना है, न कि इसे प्रतिशोध का माध्यम बनने देना।

अदालत ने कहा कि जहां एक ओर पत्नी की शिकायत को गंभीरता से सुनना आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर केवल रिश्तेदारी के आधार पर किसी व्यक्ति को लंबे आपराधिक मुकदमे में घसीटना भी न्यायसंगत नहीं है।

मामला उस याचिका से जुड़ा था जिसमें पति और उसके परिजनों ने उनके खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी। पत्नी और पति का विवाह 29 जून 2015 को हुआ था तथा 30 जुलाई 2016 को उनके यहां एक पुत्र का जन्म हुआ।

अभियोजन के अनुसार पति ने पत्नी के साथ दुर्व्यवहार किया, दूसरी महिला से संबंध बनाए, उसके साथ मारपीट की और मोबाइल फोन का पासवर्ड जानने के लिए दबाव डाला। आरोप है कि पति के परिजनों ने भी उसके इस व्यवहार का समर्थन किया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि वैवाहिक जीवन के सामान्य मतभेदों को आपराधिक रंग दिया गया। पति के रिश्तेदारों को केवल इसलिए मामले में शामिल किया गया, क्योंकि वे उसके परिवार के सदस्य हैं। उनके खिलाफ किसी विशेष घटना, तारीख, भूमिका या क्रूरता से संबंधित कोई स्पष्ट आरोप नहीं लगाया गया।

राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि आरोपपत्र दाखिल हो चुका है और आरोपों की सत्यता का परीक्षण मुकदमे के दौरान होना चाहिए।

राज्य ने यह भी कहा कि पति के खिलाफ लगाए गए आरोप विशिष्ट हैं और मामले की सुनवाई होनी चाहिए।

सुनवाई के दौरान हाइकोर्ट ने पाया कि पति के खिलाफ लगाए गए आरोप वैवाहिक क्रूरता, मारपीट और दुर्व्यवहार से संबंधित हैं, जिनकी सच्चाई का निर्धारण साक्ष्यों के आधार पर मुकदमे में किया जा सकता है। इसलिए उसके खिलाफ कार्यवाही जारी रखने का आधार मौजूद है।

हालांकि, पति के रिश्तेदारों के संबंध में अदालत ने कहा कि आरोपपत्र में उनके खिलाफ कोई स्पष्ट और व्यक्तिगत भूमिका नहीं बताई गई। न तो किसी अवैध मांग का विशिष्ट आरोप है और न ही ऐसा कोई कृत्य बताया गया, जो धारा 498ए के तहत क्रूरता की कानूनी परिभाषा में आता हो।

अदालत ने कहा,

"सिर्फ यह कहना कि उन्होंने पति का समर्थन किया या ससुराल पक्ष ने मानसिक प्रताड़ना दी, अपने आप में धारा 498ए के तहत अपराध स्थापित नहीं करता। केवल रिश्तेदारी के आधार पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।"

इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने पति के रिश्तेदारों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की, जबकि पति के खिलाफ मुकदमा जारी रखने की अनुमति दी।

अदालत ने इस प्रकार याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए राहत प्रदान की।

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