मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि जाति के आधार पर अनुसूचित जाति के किसी व्यक्ति को मंदिर में प्रवेश से रोकना छुआछूत की प्रथा के समान है और यह संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत मिले मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह की प्रथा अपनाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कानून के अनुसार मुकदमा चलाया जा सकता है।

जस्टिस भरत चक्रवर्ती ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को जातिगत आधार पर मंदिर में प्रवेश करने से रोका जाता है, खासकर तब जब वह अनुसूचित जाति से संबंधित हो तो ऐसा कृत्य छुआछूत की श्रेणी में आएगा। ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कानून के मुताबिक अभियोजन चलाया जा सकता है।

अदालत ने कहा,

“जाति के आधार पर किसी व्यक्ति को मंदिर में प्रवेश से रोकना छुआछूत की प्रथा है और संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत मिले मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।”

मामला सलेम निवासी वी. सुंदरम की याचिका से जुड़ा था। उन्होंने सलेम के जिला कलेक्टर, अत्तूर के राजस्व मंडल अधिकारी और तहसीलदार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देने की मांग की थी कि मिलागु कट्टन आदि द्रविड़ समुदाय को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए और उसे अरुलमिगु मुथु मरियम्मन मंदिर के रथ उत्सव में भाग लेने की अनुमति मिले।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से विशेष सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि इस मुद्दे पर शांति समिति की बैठक आयोजित की गई और उत्सव में सभी लोगों को शामिल होने की अनुमति दी जाएगी।

राज्य की ओर से कहा गया कि इस आश्वासन के बाद याचिका पर विचार करने का कोई आधार नहीं बचता।

हालांकि, याचिकाकर्ता ने कहा कि इस वर्ष लोगों को उत्सव में शामिल होने की अनुमति दे दी गई, लेकिन भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा पैदा न हो इसके लिए भी आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए।

उन्होंने कहा कि सभी लोगों को बिना किसी भेदभाव के मंदिर के उत्सव में भाग लेने का अधिकार सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि तमिलनाडु मंदिर प्रवेश प्राधिकरण कानून में भी स्पष्ट रूप से प्रावधान है कि किसी व्यक्ति को जाति के आधार पर मंदिर में प्रवेश से नहीं रोका जा सकता।

अदालत ने अपने पूर्व के कई आदेशों का भी उल्लेख किया, जिनमें स्पष्ट किया जा चुका है कि जाति के आधार पर किसी व्यक्ति को मंदिर में प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को जाति के आधार पर मंदिर में प्रवेश से रोकना केवल सामाजिक भेदभाव का मामला नहीं है बल्कि संविधान द्वारा संरक्षित मौलिक अधिकार से जुड़ा विषय है। ऐसी रोक लगाने वाला व्यक्ति कानून के तहत कार्रवाई का सामना कर सकता है।

हालांकि, मौजूदा मामले में राज्य सरकार के इस आश्वासन को दर्ज किया गया कि उत्सव में किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जाएगा।

अदालत ने यह भी कहा कि मंदिर के किसी उत्सव को आयोजित करने या उसके प्रशासन से संबंधित अधिकार को लेकर यदि पक्षों के बीच कोई विवाद है तो वे उचित राहत के लिए दीवानी अदालत का रुख कर सकते हैं।

राज्य के आश्वासन और पक्षों की दलीलें दर्ज करने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा किया।

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