स्कूल के सामाजिक विज्ञान सिलेबस में डॉ. अंबेडकर के जीवन को शामिल करे राज्य सरकार: मद्रास हाईकोर्ट
मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया कि वह सामाजिक विज्ञान के सिलेबस में डॉ. बी.आर. अंबेडकर के जीवन और योगदान, और आज़ादी की लड़ाई और लोकतांत्रिक राष्ट्र-निर्माण में उनकी भूमिका से जुड़े पाठों को शामिल करने के लिए ज़रूरी नीतिगत फ़ैसले ले।
जस्टिस विक्टोरिया गौरी ने ज़ोर देकर कहा कि स्कूल सिस्टम को संविधान को सिर्फ़ कुछ नीरस संस्थागत तथ्यों के तौर पर नहीं पढ़ाना चाहिए, बल्कि उन लोगों के जीवन के ज़रिए पढ़ाना चाहिए जिन्होंने इसे बनाया। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अंबेडकर को समझने का मतलब यह समझना है कि संविधान का सामाजिक होना क्यों ज़रूरी है।
कोर्ट ने कहा,
“स्कूल सिस्टम को संविधान को सिर्फ़ कुछ नीरस संस्थागत तथ्यों के तौर पर नहीं पढ़ाना चाहिए। उसे भारत की संवैधानिक यात्रा उन लोगों के जीवन के ज़रिए पढ़ानी चाहिए, जिन्होंने इसे बनाया। उनमें से डॉ. बी.आर. अंबेडकर का स्थान सबसे ऊँचा है। उन्हें जानने का मतलब यह समझना है कि संविधान समानता पर इतना ज़ोर क्यों देता है। उनका अध्ययन करने का मतलब यह समझना है कि लोकतंत्र के राजनीतिक बने रहने के लिए उसका सामाजिक होना क्यों ज़रूरी है। उन्हें याद करने का मतलब यह याद रखना है कि गणतंत्र एक नैतिक परियोजना है, न कि सिर्फ़ एक भौगोलिक व्यवस्था।”
कोर्ट ने आगे कहा कि हालांकि यह न्यायपालिका का काम नहीं है कि वह सरकार को कोई खास नीति अपनाने को कहे या यह तय करे कि सिलेबस में क्या शामिल किया जाना चाहिए। फिर भी उसे इस बात पर ज़ोर देना ज़रूरी लगा कि भाईचारे के संवैधानिक मूल्य को सामाजिक तौर पर अपने आप फैलने के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। कोर्ट ने आगे कहा कि अब समय आ गया कि सरकार यह पहचाने कि संवैधानिक साक्षरता भी सामाजिक ज़िम्मेदारी का ही एक हिस्सा है।
कोर्ट ने कहा,
“हमारे संविधान ने जो बीज बोए हैं—खासकर न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के बीज—अगर उन्हें हमेशा जीवित रखना है तो उन्हें पूरी चेतना के साथ सींचना होगा। अब समय आ गया है कि सरकार यह पहचाने कि संवैधानिक साक्षरता अपने आप में सामाजिक ज़िम्मेदारी का ही एक हिस्सा है। भविष्य के भारत के लिए, और युवा भारतीयों को जागरूक, मानवीय और संवैधानिक रूप से सचेत नागरिक बनाने के लिए ऐसे उपायों को अब और टाला नहीं जा सकता।”
कोर्ट ने ये निर्देश एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। इस याचिका में 26 और 29 साल के दो युवकों के ख़िलाफ़ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई थी। इन युवकों पर डॉ. अंबेडकर की जयंती के अवसर पर लगाई गई उनकी तस्वीर का अपमान करने का आरोप है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता ने पुलिकुथी बस स्टैंड पर डॉ. अंबेडकर की तस्वीरें लगाई थीं। पहले याचिकाकर्ता ने ऐसा ही एक पोस्टर फाड़ दिया और उस पर पेशाब किया, जबकि दूसरे याचिकाकर्ता ने इसका वीडियो बनाया और उसे WhatsApp पर फैला दिया। शिकायत के आधार पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) के तहत अपराधों के लिए एक मामला दर्ज किया गया।
याचिकाकर्ताओं ने समझौते के आधार पर मामला रद्द करने की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया। वास्तविक शिकायतकर्ता ने भी कार्यवाही रद्द करने पर सहमति जताई और कोई आपत्ति नहीं उठाई। चूंकि अपराध गैर-समझौता योग्य है, इसलिए याचिकाकर्ताओं ने अदालत से अपनी अंतर्निहित अधिकारिता (Inherent Jurisdiction) का प्रयोग करने का अनुरोध किया।
जब यह मामला पहले सुनवाई के लिए आया तो अदालत ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि क्या वे डॉ. अंबेडकर के जीवन और शिक्षाओं के बारे में जानते हैं। उनके जवाबों से अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि वे जानते थे कि वे एक महान विधिवेत्ता थे, लेकिन उन्हें उनके जीवन, उनकी विद्वत्ता, संविधान निर्माण में उनकी भूमिका, या दबे-कुचले लोगों की मुक्ति और भारतीय समाज के लोकतंत्रीकरण में उनके योगदान की कोई वास्तविक समझ नहीं थी।
यह देखते हुए कि याचिकाकर्ताओं को इन बातों से अवगत कराया जाना चाहिए, अदालत ने उन्हें डॉ. अंबेडकर की जीवनी पर तमिल भाषा में 101 किताबें खरीदने का निर्देश दिया; उनमें से एक किताब उन्हें अपने पास रखनी थी और बाकी 100 किताबें टी. कल्लुपट्टी स्थित मुरुगप्पा सरकारी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के 11वीं और 12वीं कक्षा के छात्रों को बांटनी थीं। अदालत ने उन व्यक्तियों से पूरी किताब पढ़ने और एक मौखिक परीक्षा के लिए तैयार रहने को कहा।
इसके बाद जब यह मामला सुनवाई के लिए आया तो अदालत ने उन दोनों व्यक्तियों से डॉ. अंबेडकर के जीवन के बारे में सवाल पूछे और उन्हें सकारात्मक जवाब मिले। अदालत ने यह भी पाया कि उन व्यक्तियों ने अपनी अज्ञानता के लिए खेद व्यक्त किया और क्षमा मांगी। अदालत ने टिप्पणी की कि उनका पश्चाताप सच्चा है और उनमें आया बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
अदालत ने टिप्पणी की,
"अदालत द्वारा अपनाए गए इस तरीके का महत्व इस तथ्य में निहित है कि न्याय प्रणाली—विशेष रूप से जब वह युवा अपराधियों से जुड़े मामलों को देखती है—को हमेशा एक तरफ बिना सोचे-समझे दंड देने और दूसरी तरफ बिना सोचे-समझे मामले को बंद कर देने के बीच ही चुनाव नहीं करना चाहिए। उपयुक्त मामलों में एक संकरा लेकिन मूल्यवान सुधारात्मक मार्ग भी मौजूद होता है; एक ऐसा मार्ग जो न्यायिक नरमी के लिए जवाबदेही, पश्चाताप, शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी को अनिवार्य शर्तों के रूप में स्थापित करता है।"
अतः, यह देखते हुए कि कानून का सुधारात्मक उद्देश्य काफी हद तक पूरा हो चुका है। इसलिए कार्यवाही को समाप्त कर देने से न्याय के उद्देश्यों की बेहतर पूर्ति होगी, अदालत ने इस कार्यवाही को रद्द करने का निर्णय लिया।
Case Title: G Rajesh and Another v. The State of Tamil Nadu and Others