श्रम कानून फायदेमंद कानून, लिमिटेशन पर बहुत ज़्यादा तकनीकी नज़रिए से बचना चाहिए: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि मज़दूरों द्वारा किए गए दावों को लिमिटेशन के बहुत ज़्यादा तकनीकी आधार पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए खासकर जब देरी COVID-19 महामारी और कानूनी जागरूकता की कमी के कारण हुई हो।
श्रम कल्याण कानूनों के फायदेमंद स्वभाव पर ज़ोर देते हुए कोर्ट ने मेडिकैप्स लिमिटेड द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज की, जिसमें इंदौर की इंडस्ट्रियल कोर्ट द्वारा पारित रिमांड आदेश को चुनौती दी गई थी।
यह मामला 22 नवंबर, 2019 को मेडिकैप्स लिमिटेड के औद्योगिक प्रतिष्ठान के बंद होने से जुड़ा है। नियोक्ता ने तर्क दिया कि यह बंद इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट 1947 और मध्य प्रदेश इंडस्ट्रियल रिलेशन्स एक्ट 1960 के तहत उचित प्रक्रिया का पालन करने के बाद किया गया था और सभी कर्मचारियों को उनके कानूनी बकाए का भुगतान कर दिया गया। हालांकि, कुछ मज़दूरों ने MPIR Act के तहत आवेदन दायर करके इस बंद को चुनौती दी जिन्हें लेबर कोर्ट ने खारिज कर दिया। बाद में इंडस्ट्रियल कोर्ट ने इस फैसले की पुष्टि करते हुए बंद को कानूनी और वैध माना।
इसके बाद मज़दूरों ने लेबर कोर्ट में एक नया आवेदन दायर किया, जिसमें दावा किया गया कि उनकी सेवाएं 22 नवंबर, 2019 को समाप्त कर दी गई ।
उन्होंने दलील दी कि इसके तुरंत बाद COVID-19 महामारी के कारण देशव्यापी लॉकडाउन लग गया और अशिक्षा और कानूनी ज्ञान की कमी के कारण, वे निर्धारित लिमिटेशन अवधि के भीतर अपने उपायों का पालन नहीं कर पाए। इसलिए देरी माफ करने के लिए एक आवेदन दायर किया गया।
लेबर कोर्ट ने उक्त दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह MPIR Act की धारा 62 के तहत लिमिटेशन से बाधित था, जो ऐसे विवादों को उठाने के लिए एक साल की अवधि निर्धारित करती है।
इस आदेश से दुखी होकर मज़दूरों ने इंडस्ट्रियल कोर्ट का रुख किया, जिसने लेबर कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों पर भरोसा करते हुए देरी को माफ कर दिया, जिसमें COVID-19 अवधि के दौरान फरवरी, 2022 तक लिमिटेशन को बढ़ाया गया था। मामले को योग्यता के आधार पर फैसले के लिए लेबर कोर्ट को वापस भेज दिया गया।
रिमांड आदेश को चुनौती देते हुए नियोक्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि देरी बहुत ज़्यादा और बिना किसी स्पष्टीकरण के थी और COVID-19 अवधि को हटाने के बाद भी लगभग पंद्रह महीने की बिना स्पष्टीकरण के देरी बनी रही।
यह भी तर्क दिया गया कि बंद का मुद्दा पहले ही अंतिम रूप ले चुका था और इसे अप्रत्यक्ष रूप से फिर से नहीं खोला जा सकता था।
इन दलीलों को खारिज करते हुए जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने कहा कि इंडस्ट्रियल कोर्ट ने इस मामले में सही उदार रुख अपनाया था।
कोर्ट ने कहा कि मजदूरों ने खास तौर पर अशिक्षा और कानूनी प्रावधानों की जानकारी न होने की बात कही थी और देरी का एक बड़ा हिस्सा महामारी के समय का था।
बेंच ने दोहराया कि श्रम कानून फायदेमंद होते हैं। ऐसे मामलों में लिमिटेशन से निपटते समय अदालतों को बहुत ज़्यादा तकनीकी रवैया अपनाने से बचना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के इंदर सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2025 SCC OnLine SC 600) मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया कि वास्तविक न्याय को बढ़ावा देने के लिए लिमिटेशन पर नरम रुख अपनाया जा सकता है।
इंडस्ट्रियल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए हाईकोर्ट ने साफ किया कि नियोक्ता नए कार्यवाही के दौरान लेबर कोर्ट के सामने सभी उपलब्ध आपत्तियां उठाने के लिए स्वतंत्र होगा।
इसके अनुसार, रिट याचिका खारिज कर दी गई और लागत के बारे में कोई आदेश नहीं दिया गया।