Hindu Marriage Act के तहत जनजातियों को बहुविवाह की खुली छूट नहीं: मध्य प्रदेश हाइकोर्ट का स्पष्ट फैसला
मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) की धारा 2(2) के तहत अनुसूचित जनजातियों को दी गई छूट का मतलब यह नहीं है कि वे बिना किसी परंपरा के बहुविवाह को उचित ठहरा सकें।
जस्टिस विवेक जैन की पीठ ने कहा कि यह प्रावधान केवल जनजातीय परंपराओं और मान्यताओं की रक्षा के लिए है, न कि बहुविवाह जैसे प्रथाओं को मनमाने ढंग से अपनाने की अनुमति देने के लिए।
मामला मुन्नी बाई द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें उसने अपने पति की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की मांग की थी। उसका दावा था कि वह दूसरी पत्नी है और दोनों पत्नियों को संपत्ति में बराबर हिस्सा मिलना चाहिए, क्योंकि वे अनुसूचित जनजाति से हैं जहां बहुविवाह मान्य है।
हालांकि, पहली पत्नी ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि वही वैध पत्नी है और सरकारी अभिलेखों में भी उसी का नाम दर्ज है।
अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सकी कि उसकी जनजाति में बहुविवाह की कोई स्थापित और मान्य परंपरा है। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई जनजाति हिंदू कानून से अलग छूट का दावा करती है तो उसे यह साबित करना होगा कि उसकी अलग सामाजिक परंपराएं वास्तव में अस्तित्व में हैं और समाज द्वारा स्वीकार की जाती हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि कुछ जनजातियों में बहुविवाह या अन्य प्रथाएं हो सकती हैं, लेकिन उन्हें साबित करना जरूरी है। केवल दावा करने से छूट नहीं मिल सकती।
कोर्ट ने पाया कि संबंधित जनजाति में ऐसी कोई परंपरा साबित नहीं हुई, इसलिए निचली अदालतों के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।
अंततः हाइकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए साफ किया कि बिना प्रमाणित परंपरा के बहुविवाह को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।