सरदार सरोवर विस्थापितों की शिकायतें दूर करे सरकार: मेधा पाटकर की याचिका पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का निर्देश
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सरदार सरोवर बांध परियोजना से विस्थापित परिवारों के पुनर्वास और भूखंड आवंटन से जुड़ी शिकायतों पर राज्य सरकार को कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा कि सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर द्वारा उठाए गए मुद्दों पर अतिरिक्त मुख्य सचिव गंभीरता से विचार करें और उनका समाधान सुनिश्चित करें।
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अतिरिक्त मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि 6 मार्च 2026 को प्रस्तुत शिकायतों पर निर्णय लेने से पहले यदि आवश्यक हो तो याचिकाकर्ता को पुनः बैठक के लिए बुलाया जाए।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 29 जून, 2026 निर्धारित की।
याचिका में कहा गया कि सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित परिवारों को दिए जाने वाले आवासीय भूखंडों के आवंटन में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं। कई भूखंड बिना उचित सीमांकन और माप के आवंटित किए गए, जिससे भ्रम और विवाद की स्थिति उत्पन्न हुई।
याचिका के अनुसार अनेक विस्थापित परिवारों को वर्ष 1995 की सरकारी नीति के अनुरूप बड़े भूखंड देने का आश्वासन दिया गया, लेकिन अब तक सैकड़ों परिवारों को भूखंड नहीं मिले हैं। इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन बताया गया।
अदालत को यह भी बताया गया कि कई भूखंड कागजों पर आवंटित तो कर दिए गए, लेकिन उनका विकास या सीमांकन नहीं हुआ। निमरानी और गाजीपुरा जैसे क्षेत्रों में अनेक परिवार अब भी उचित आवास की प्रतीक्षा कर रहे हैं जबकि उनके मूल घर बांध के जलभराव में डूब चुके हैं।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि कई परिवारों को उनके मूल गांवों से 20 किलोमीटर तक दूर भूखंड दिए गए, जबकि पुनर्वास नीति के अनुसार वैकल्पिक भूमि डूब क्षेत्र के निकट होनी चाहिए।
मामले में भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और फर्जी दस्तावेजों के जरिए आवंटन में गड़बड़ियों के आरोप भी लगाए गए।
हाईकोर्ट ने पूर्व आदेशों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2002 में विस्थापित परिवारों को आवंटन पत्र तो जारी कर दिए गए, लेकिन उनका पंजीकरण अब तक नहीं हुआ, जिससे परिवारों को पूर्ण स्वामित्व अधिकार नहीं मिल पाया है।
अदालत ने पहले भी इस देरी पर नाराजगी जताई थी और राज्य सरकार से स्पष्ट नीति मांगी थी।
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि पंजीकरण प्रक्रिया के लिए मानक संचालन प्रक्रिया तैयार कर ली गई और काम जारी है। हालांकि विस्थापितों के मौसमी पलायन तथा मृत आवंटियों के मामलों में उत्तराधिकारियों के बीच सहमति न बनने जैसी व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण देरी हो रही है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विस्थापित परिवारों के अधिकारों की रक्षा और पुनर्वास प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है।