यूनिवर्सिटी शिक्षक 'पब्लिक ऑफिस' नहीं, क्वो वारंटो याचिका नहीं चलेगी: एमपी हाईकोर्ट

Update: 2026-03-27 11:21 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यूनिवर्सिटी में शिक्षक, प्रोफेसर या रीडर 'पब्लिक ऑफिस' के दायरे में नहीं आते इसलिए उनके खिलाफ क्वो वारंटो याचिका दायर नहीं की जा सकती।

जस्टिस जय कुमार पिल्लई की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

मामला एक यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस के लेक्चरर की नियुक्ति को चुनौती देने से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि नियुक्त व्यक्ति के पास आवश्यक शैक्षणिक योग्यता नहीं थी और उसने गलत प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए।

अदालत ने पहले यह स्पष्ट किया कि 'क्वो वारंटो' एक विशेष प्रकार की रिट है, जो तभी जारी होती है जब कोई व्यक्ति किसी सार्वजनिक पद पर बिना वैधानिक अधिकार के बैठा हो।

पीठ ने कहा कि इस तरह की रिट जारी करने के लिए जरूरी है कि संबंधित पद पब्लिक ऑफिस हो, जिसकी जिम्मेदारियां सीधे तौर पर सार्वजनिक कार्यों और नागरिकों के अधिकारों से जुड़ी हों।

अदालत ने टिप्पणी की,

“प्रोफेसर या शिक्षक कोई संप्रभु या सार्वजनिक कार्य नहीं करते। वे ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करते, जो व्यापक रूप से नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित करें।”

हाईकोर्ट ने कहा कि यूनिवर्सिटी के शिक्षक का पद मूल रूप से नियोक्ता और कर्मचारी के संबंध के दायरे में आता है, न कि सार्वजनिक पद की श्रेणी में।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षण कार्य महत्वपूर्ण जरूर है लेकिन इसे 'पब्लिक ऑफिस' नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसमें शासन से जुड़ी शक्तियों या सार्वजनिक अधिकारों का सीधा प्रयोग नहीं होता।

इसी आधार पर अदालत ने कहा कि इस मामले में 'क्वो वारंटो' रिट की मूल शर्तें पूरी नहीं होतीं और याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।

अंततः हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।

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