बिजली चोरी में उपभोक्ता की देयता तय करने का अधिकार केवल विशेष अदालत को, वितरण कंपनी नहीं कर सकती वसूली तय: एमपी हाईकोर्ट
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिजली चोरी के मामलों में उपभोक्ता की सिविल देयता तय करने का अधिकार केवल बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 154 के तहत गठित विशेष अदालत को है। बिजली वितरण कंपनी या उसके अधिकारी स्वयं यह देयता निर्धारित कर मांग नहीं उठा सकते।
जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के ने मध्यप्रदेश मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड का आदेश रद्द कर दिया, जिसके तहत कथित बिजली चोरी के मामले में याचिकाकर्ता पर 1 लाख 16 हजार 734 रुपये की सिविल देयता तय करते हुए राशि जमा करने का निर्देश दिया गया।
अदालत ने कहा,
"बिजली अधिनियम की धारा 154(5) के अनुसार विशेष अदालत को बिजली चोरी के मामलों में दंडात्मक कार्रवाई के साथ-साथ उपभोक्ता या संबंधित व्यक्ति की सिविल देयता निर्धारित करने का भी अधिकार है। जब यह अधिकार विशेष अदालत को दिया गया, तब विभागीय अधिकारी स्वयं यह शक्ति नहीं अपना सकते और न ही देयता तय कर मांग पत्र जारी कर सकते हैं।"
याचिकाकर्ता ने विभाग के प्रभारी अधिकारी के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उससे उक्त राशि जमा कराने का निर्देश दिया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि बिजली अधिनियम की धारा 135 अपराध और दंड से संबंधित है, जबकि धारा 154(5) स्पष्ट रूप से विशेष अदालत को बिजली चोरी के मामलों में सिविल देयता तय करने का अधिकार देती है। इसलिए विभागीय अधिकारी द्वारा देयता निर्धारित करना कानून के विपरीत है।
हाईकोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि बिजली चोरी के मामले में सिविल देयता का निर्धारण केवल विशेष अदालत ही कर सकती है।
इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए विभाग का आदेश रद्द किया।