बालाघाट में बैगा समुदाय के 25 बच्चों की मौत का मामला, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से मांगा जवाब
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में बैगा समुदाय के 25 बच्चों की कथित तौर पर संक्रामक बीमारियों और कुपोषण के कारण हुई मौतों का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया।
इस मामले में दायर जनहित याचिका पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा।
याचिका में आरोप लगाया गया कि दूरदराज के गांवों में रहने वाले विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह के बच्चों को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, जिसके चलते उन्हें गंभीर बीमारियों और कुपोषण का सामना करना पड़ रहा है।
एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने 3 सितंबर 2026 को याचिकाकर्ता को स्वयं प्रभावित क्षेत्र का दौरा कर जमीनी स्थिति की जानकारी देने और हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था।
अदालत का कहना था कि केवल प्रकाशित खबर के आधार पर लगाए गए आरोपों पर तब तक प्रभावी सुनवाई नहीं की जा सकती, जब तक याचिकाकर्ता स्वयं मौके की स्थिति की जानकारी अदालत के सामने नहीं रखता।
बुधवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने 3 सितंबर के आदेश के अनुपालन में प्रभावित इलाके का व्यक्तिगत दौरा किया और वहां से विभिन्न जानकारियां जुटाईं।
याचिकाकर्ता ने 9 सितंबर को इस संबंध में हलफनामा भी दाखिल किया।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि हलफनामे में सामने आए सभी तथ्यों को याचिका में संशोधन के जरिए रिकॉर्ड पर लाया जाए, ताकि संबंधित पक्षों से इस पर जवाब मांगा जा सके।
याचिकाकर्ता ने बताया कि उसने यह जनहित याचिका 'द पायनियर' में प्रकाशित एक खबर के आधार पर दाखिल की है।
याचिका के अनुसार बालाघाट जिले के बिरसा और बैहर ब्लॉक के दूरदराज के गांवों में बैगा समुदाय के परिवार रहते हैं। बैगा समुदाय को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह में शामिल किया गया।
याचिका में दावा किया गया कि इन इलाकों में करीब 25 बच्चों की अलग-अलग बीमारियों के कारण मौत हुई। इनमें खसरा, मलेरिया, फाल्सीपेरम मलेरिया, तेज बुखार, खुजली और गंभीर कुपोषण जैसी बीमारियों का उल्लेख किया गया।
याचिका में यह भी दावा किया गया कि जिला प्रशासन ने जून 2026 से हुई आठ बच्चों की मौतों को मलेरिया और खसरा जैसी मौसमी बीमारियों से जोड़ा है, जबकि कुछ अन्य मौतों के पीछे अलग-अलग कारण बताए गए। याचिकाकर्ता का आरोप है कि प्रभावित परिवार बेहद गरीब हैं और उनके पास समय पर इलाज कराने के पर्याप्त साधन नहीं हैं।
याचिका के मुताबिक प्रभावित गांवों से निकटतम प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की दूरी करीब 15 से 40 किलोमीटर तक है। ऐसे में कई परिवार इलाज के लिए पारंपरिक उपचार पद्धतियों या स्थानीय और कथित तौर पर बिना पर्याप्त योग्यता वाले चिकित्सकों पर निर्भर रहने को मजबूर हैं।
याचिका में कहा गया कि सरकार की ओर से अस्थायी मेडिकल शिविर लगाए जा रहे हैं, लेकिन दूरदराज के इलाकों में बच्चों की स्थिति को देखते हुए ये प्रयास पर्याप्त नहीं हैं।
याचिकाकर्ता ने स्वास्थ्य संकट के लिए केवल बीमारी ही नहीं, बल्कि कुपोषण, स्वच्छता, पेयजल और स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुंच को भी जिम्मेदार बताया।
याचिका में कहा गया कि संविधान के तहत राज्य सरकार पर कमजोर और वंचित बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा करने तथा ऐसी बीमारियों की रोकथाम के लिए प्रभावी कदम उठाने की जिम्मेदारी है, जिन्हें समय पर उपचार और बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था के जरिए रोका जा सकता है।
जनहित याचिका में हाईकोर्ट से प्रभावित गांवों में बच्चों का तत्काल और व्यापक स्वास्थ्य सर्वेक्षण कराने का निर्देश देने की मांग की गई। इसके साथ ही मौतों के वास्तविक कारणों का पता लगाने के लिए उच्चस्तरीय मेडिकल या विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग की गई।
याचिका में यह भी मांग की गई कि प्रभावित बच्चों को सरकारी अस्पतालों या अन्य उचित चिकित्सा केंद्रों में भर्ती कराया जाए और सरकारी नियमों के अनुसार उन्हें मुफ्त में पर्याप्त, पौष्टिक तथा स्वच्छ तरीके से तैयार भोजन दिन में कम से कम तीन बार उपलब्ध कराया जाए।
इसके अलावा गांववार रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश करने की मांग की गई है, जिसमें प्रभावित बच्चों की संख्या, उनकी बीमारी, उन्हें दिए गए उपचार और उनकी वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति का विवरण हो।
याचिकाकर्ता ने प्रभावित और आसपास के दूरदराज के गांवों में पर्याप्त मोबाइल मेडिकल यूनिट्स और आपातकालीन मेडिकल शिविर तत्काल स्थापित करने, संक्रामक बीमारियों की जांच और उपचार की व्यवस्था करने तथा जरूरी दवाओं और आपातकालीन रेफरल सुविधा की उपलब्धता सुनिश्चित करने की भी मांग की। याचिका में इन मांगों से संबंधित अन्य राहतें भी मांगी गई।
अब हाईकोर्ट के निर्देश के बाद याचिका में याचिकाकर्ता के व्यक्तिगत दौरे और उसके हलफनामे में सामने आए तथ्यों को औपचारिक रूप से रिकॉर्ड पर लाया जाएगा।
इसके बाद राज्य सरकार और अन्य संबंधित पक्षों से इन गंभीर आरोपों पर जवाब मांगा जाएगा।