मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ग्राम रोजगार सहायक की नियुक्ति रद्द करने का आदेश बरकरार रखते हुए कहा कि फर्जी या जालसाजी किए गए सरकारी अभिलेखों के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल करने वाले व्यक्ति को पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि नियुक्ति की नींव ही धोखाधड़ी पर आधारित हो तो उस पर कोई वैध अधिकार कायम नहीं हो सकता।

जस्टिस विवेक कुमार सिंह की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने निर्धारित अंतिम तारीख के बाद आवेदन स्वीकार कराने के लिए ग्राम पंचायत के रजिस्टर में हेरफेर किया था। ऐसे में उसकी नियुक्ति शुरू से ही अवैध थी।

मामला ग्राम पंचायत मेदनीपुर में ग्राम रोजगार सहायक के पद पर नियुक्ति से जुड़ा था। राज्य सरकार ने 10 नवंबर 2009 को भर्ती संबंधी दिशा-निर्देश जारी किए और आवेदन जमा करने की अंतिम तारीख 5 मार्च 2010 निर्धारित की गई। याचिकाकर्ता की नियुक्ति 28 जुलाई 2010 को हुई थी। बाद में शिकायत मिलने पर उसकी नियुक्ति रद्द की गई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि उसने निर्धारित समय सीमा के बाद आवेदन जमा किया।

विवाद ग्राम पंचायत के आवेदन प्राप्ति रजिस्टर में दर्ज तारीख को लेकर था। रजिस्टर में याचिकाकर्ता का आवेदन 5 मार्च 2010 को प्राप्त होना दर्ज था। लेकिन आवेदन के साथ लगाए गए रैडिक्स कॉलेज के कंप्यूटर अनुभव प्रमाणपत्र पर 9 मार्च 2010 की तारीख दर्ज थी। अधिकारियों ने माना कि ऐसा प्रमाणपत्र 9 मार्च को जारी हुआ था तो उसके आधार पर उससे पहले आवेदन जमा किया जाना संभव नहीं था।

याचिकाकर्ता ने सतना के कलेक्टर के समक्ष अपील की, लेकिन उसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने पहले नियुक्ति रद्द करने का आदेश निरस्त करते हुए कलेक्टर को ग्राम पंचायत के आवेदन प्राप्ति रजिस्टर में संबंधित प्रविष्टि तैयार किए जाने की जांच करने का निर्देश दिया।

जांच के दौरान कलेक्टर ने 4 मार्च 2010 की रजिस्टर प्रविष्टि की जांच की और पाया कि अंतिम तारीख निकलने के बाद याचिकाकर्ता को लाभ पहुंचाने के लिए प्रविष्टि में जालसाजी की गई। इसके बाद नियुक्ति रद्द करने का आदेश पारित किया गया, जिसे याचिकाकर्ता ने फिर हाईकोर्ट में चुनौती दी।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि कलेक्टर ने बिना उचित जांच के अपने पुराने निष्कर्ष को ही दोहरा दिया। यह भी कहा गया कि भले ही कंप्यूटर अनुभव प्रमाणपत्र 9 मार्च 2010 का माना जाए, लेकिन उसके लिए कोई अंक निर्धारित नहीं थे, इसलिए वह प्रमाणपत्र चयन में निर्णायक नहीं था। इस आधार पर नियुक्ति रद्द करना गलत बताया गया।

होईकोर्ट ने इस दलील को खारिज किया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता दरअसल तथ्यों और साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन कराने की मांग कर रहा है। संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट सक्षम प्राधिकारी द्वारा दर्ज किए गए तथ्यात्मक निष्कर्षों पर अपीलीय अदालत की तरह साक्ष्यों का दोबारा मूल्यांकन नहीं करता, जब तक कि निष्कर्ष पूरी तरह गलत या असंगत साबित न हों।

अदालत ने कहा कि यह तर्क भी स्वीकार नहीं किया जा सकता कि जालसाजी महत्वहीन है, क्योंकि संबंधित प्रमाणपत्र से चयन के अंकों पर कोई असर नहीं पड़ा। पीठ ने धोखाधड़ी के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि धोखे से हासिल किया गया लाभ वैध अधिकार पैदा नहीं कर सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि आवेदन समय पर और ईमानदारी से जमा किए जाने की मूल प्रक्रिया ही फर्जीवाड़े और तारीख में हेरफेर से प्रभावित है, तो नियुक्ति की पूरी बुनियाद ही खत्म हो जाती है।

अदालत ने माना कि सतना के कलेक्टर ने हाईकोर्ट के पहले आदेश के अनुरूप जांच की। उसके बाद नियुक्ति रद्द करने का निर्णय लिया। इसलिए मौजूदा आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए नियुक्ति रद्द करने का आदेश बरकरार रखा।

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