अदालत में गर्भपात हुए भ्रूण को लाकर सहानुभूति लेने की कोशिश अत्यंत अनुचित: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2026-03-16 10:43 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अदालत में गर्भपात हुए भ्रूण को लाकर सहानुभूति हासिल करने की कोशिश करने वाले याचिकाकर्ता की याचिका खारिज करते हुए कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि इस प्रकार का आचरण आपत्तिजनक, अनुचित है और इससे अदालत की गरिमा और मर्यादा कम होती है।

जस्टिस हिमांशु जोशी की पीठ ने कहा,

“याचिकाकर्ता ने कार्यवाही के दौरान अदालत के मंच के सामने भ्रूण रख दिया, जिससे स्पष्ट है कि वह अदालत की सहानुभूति प्राप्त करना चाहता था। यह कृत्य अत्यंत आपत्तिजनक और अनुचित है। अदालत की कार्यवाही को भावनात्मक प्रदर्शन या सहानुभूति प्राप्त करने का मंच नहीं बनाया जा सकता।”

याचिकाकर्ता का दावा था कि उसने एक निजी कंपनी में 200 करोड़ रुपये से अधिक के गबन और चोरी का खुलासा किया, जिसके बाद उसे और उसके परिवार को कई बार प्रताड़ित किया गया। उसने यह भी आरोप लगाया कि राष्ट्रपति और केंद्र व राज्य सरकार के विभिन्न अधिकारियों को शिकायत देने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई।

उसने यह भी कहा कि एक कार से हमले के कारण उसकी पत्नी को गंभीर चोटें आईं और उसका गर्भपात हो गया। याचिकाकर्ता इसी भ्रूण को अदालत में लेकर आया और पहले इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी। बाद में उसने अपनी मांग बदलते हुए कथित शारीरिक, मानसिक और आर्थिक नुकसान के लिए मुआवजा और क्षतिपूर्ति की मांग की।

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता पहले भी इसी घटना से संबंधित दो याचिकाएं दायर कर चुका था, जिन्हें बाद में वापस ले लिया गया ताकि वह उचित मंच पर जा सके। अदालत ने यह भी कहा कि याचिका में लगाए गए गंभीर आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए।

अदालत ने कहा कि विभिन्न सरकारी अधिकारियों और एक निजी कंपनी के खिलाफ बिना किसी ठोस सामग्री के गंभीर आरोप लगाना यह दर्शाता है कि याचिका में सद्भावना का अभाव है।

पीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने अदालत में अपना रुख बार-बार बदला पहले इच्छामृत्यु की मांग की और बाद में मुआवजे की मांग करने लगा जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह अनावश्यक और अटकलों पर आधारित मुकदमेबाजी कर रहा है।

अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) के तहत उपलब्ध वैधानिक उपाय का भी उपयोग नहीं किया, जिसके तहत मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दे सकता है और FIR दर्ज कराने का निर्देश दे सकता है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भ्रूण मानव शरीर का अंग होता है और उसके साथ व्यवहार तथा निपटान जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के अनुसार किया जाना चाहिए। बिना अनुमति ऐसे अवशेषों को अदालत जैसे सार्वजनिक स्थान पर लाना न केवल नियमों का उल्लंघन है बल्कि मानव शव के प्रति अनादर के समान भी माना जा सकता है।

अदालत ने कहा,

“न्यायालय हर व्यक्ति के लिए समान है। किसी एक पक्ष के दुख या पीड़ा को दूसरे के मुकाबले तौलकर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित नहीं किया जा सकता। न्याय केवल कानून और रिकॉर्ड पर उपलब्ध वैधानिक सामग्री के आधार पर ही किया जाता है भावनात्मक प्रदर्शन के आधार पर नहीं।”

इन टिप्पणियों के साथ हाइकोर्ट ने याचिका खारिज की और याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह कानून के अनुसार संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष उचित आवेदन प्रस्तुत करे।

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